अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
11.29.2014


दाँत निपोरने की कला

बहुत कम लोग इस कला के बारे में जानते हैं। और जो जानते हैं वे इसके मर्म को बताने के लिए सीधे–सीधे तैयार नहीं होते।

वे जानते हैं की इस कला के कदरदान बढ़ गए, तो उनकी पूछ–परख में कमी आ जायेगी।

दाँत का निपोरा जाना अपने-अपने स्टाइल का अलग-अलग होता है। घर के नौकर, पति, आफिस के बाबू–चपरासी, हेड क्लर्क, साहब, बड़े साहब, संतरी-मंत्री सभी, अपने से एक ओहदे ऊँचे वालों से, घबराते नज़र आते हैं या परिस्थितिवश उनके सामने दंत-प्रदर्शन के लिए कभी न कभी बाध्य होते हैं।

में, ’एलाटेड’ काम के प्रति की गई लापरवाही से, जो बिगड़ा परिणाम सामने आता है उसी से कर्ता की घिघी बँध जाती है।

दन्त-निपोरन का बस इतना ही इतिहास है।

इस विषय में आगे शोध करने वालों को बताये देता हूँ निराशा हाथ लगेगी, वे ज़्यादा अन्दर तक घुस नहीं पायेंगे। उनके गाईड उनको इधर-उधर भटकाते रहेंगे और अंत में दाँत को इस्तमाल करते हुए आपसे कहेंगे कोई और सब्जेक्ट लेते हैं, यहाँ स्कोप नहीं है।

हाँ ये अलग बात है कि वे इतिहास के, दाँत निपोरने वाले पात्रों या परिस्थितियों पर, आपके ज्ञान में कुछ वृद्धि कर सकें, मसलन शकुनी का पासा जब दुर्योधन के पक्ष में पड़ रहा था, तो पांडव हक्के-बक्के बगले झाँक रहे थे, सब कुछ हार के, जब दाँत निपोराई की रस्म अदायगी होनी थी, तभी द्रोपदी-दु:शासन का चीर-हरण प्रकरण शुरू हो गया। सभासदों का ध्यान हट गया। कहते हैं, हारे हुए जुआड़ियों को कोई फरियाद की जगह नहीं बचती, अपील का कोई मौक़ा नहीं मिलता। वो तो द्रोपदी की पुकार थी जिसे आराध्य कृष्ण ने सुन ली, और लाज सभी की बच गई।

उन दिनों, “युद्ध न करना पड़े के लाख बहाने” जैसी किताब तब छपा नहीं करती थी।

हमारे हीरो ‘अर्जुन’, अपने सारथी कृष्ण को, तर्क देकर टाल नहीं पाए। उलटे प्रभु के तर्क उन पर हावी रहे। लगभग वे युद्ध-भूमि में "हें हें", "खी खी" करके दाँत निपोरने की अवस्था में पीछे हटने की रट लिए थे, मगर प्रभु-लीला ने बुद्धि फेर दी। युद्ध हुआ, कौरव जीते और हमको पीढ़ी-दर पीढ़ी पढ़ने के लिए उपदेशों की हमको ‘गीता’ मिल गई।

सार संक्षेप ये कि उन दिनों युद्ध में पीठ दिखाना, भरी सभा में गिड़गिड़ाना, घिघयाना या दाँत-निपोरना अक्षम्य अपराध जैसा था। आजकल ये राजनीति कहाती है। इसके जानकार प्रकांड पंडित लोगों को चाणक्य की उपाधि से विभूषित होते भी देखा जाता है।

वैसे अपवाद स्वरूप कुछ क्षत्रिय धर्म मानने वालों के लिए आज भी ये सब अपराध है। मगर कलयुग में ‘सब चलता है’ पर आस्था रखने वालों की कमी भी नहीं है। वे न केवल पीठ दिखा आते हैं, वरन पीछे पोस्टर भी टाँगे रहते हैं, हमें मत मारो हम कभी आपके काम आयेंगे।

दूसरे शब्दों में ये कहना कि भाई, हमारी मजबूरी है, कि सामने आपको चेहरा नहीं दिखा पा रहे हैं वरना दाँत निपोर के खेद प्रकट कर आपका सम्मान रख देते।

सतयुग के इन किस्सों को कुदेरने में एक और महाकाव्य लिख जाएगा। हमें मालूम है आप पढ़ नहीं पायेंगे!

आज के एसएमएस युग में, बस छोटे-मोटे किस्से ही चल सकते हैं बड़े किस्से पढ़ने की फुर्सत किसको है? सो बेहतर है कलयुग में लौटें चलें ....

 

"रामू, प्रेस करवा लाया ...?"

"वो साब जी क्या है कि, बीबी जी ने मुझ से एड़ी-घिसने का पत्थर मँगवा लिया था। पूरे बाजार में ढूढते–ढूढते थक गया, कहीं न मिला, इसी में आपका काम भूल गया।"

रामू के हाथ यकबयक कान खुजलाने में लग जाते हैं, जो इशारा करता है आइन्दा गलती नहीं होगी स्साब्जी......।

साहब, मेम पर भड़ास निकालते हैं, "ये क्या...? कल बाहर के डेलीगेट्स आ रहे हैं....... तुम्हे एड़ी केयर की पड़ी है। ढंग से एक जोड़ी कपड़े तैयार नहीं करवा पाती? शाम खाने में क्या बना रही हो .....? करेला ....? कल मीटिंग है ना ....? बहुत तैयारी करनी है। रात-भर डाक्यूमेंट्स तैयार करने हैं, करेला खा के, करेला सा जवाब दिया तो अपनी तो कम्पनी बैठ जायेगी?"

मेम साब, साबजी के, इस चिड़चिड़ाने वाले टेप को सिरे से खारिज कर देती हैं।

"देखो आफिस का टेंशन घर में तो लाया मत करो। वैसे कौन सा तीर मार लोगे अच्छे–अच्छे जवाब देके? प्रमोशन तो होना नहीं है?

मल्होत्रा साहब को देखो, साहबों के आगे खी-खी करके दाँत काढ़ते रहते हैं, सभी साहब खुश रहते हैं। चापलूसी तो आपको ज़रा सी भी आती नहीं । क्या घर क्या आफिस हर जगह ‘रुखंडे’ रहते हो। चहरे में दो इंच मुस्कान लाओ मिस्टर..... सब काम बनाता नज़र आयेगा।

ओय रामू जा साहब के सूट को अर्जेंट में ड्राई-क्लीनर्स से प्रेस करवा ला (देखें क्या तीर मारते हैं, वाले अंदाज़ में)

-हाँ बताइये कौन–कौन, कहाँ–कहाँ से आ रहे हैं।

-उनके लंच –डिनर, रुकने–ठहरने की अच्छी व्यवस्था है या नहीं?

दुनिया के डेलीगेट्स लोग इन्हीं बातों से ज़्यादा प्रभावित होते हैं।

अपने ‘चाइना वाले स्टाइल’ को अमल में लाओ भई, देखा कैसा ‘ढोकला, पूरी छोले में निपटा दिया? प्रेक्टिकल बनो .....। दुनियादारी इसी का नाम है।

डेलीगेट्स का क्या है, पर्सनल काम होता है, वही निपटाने के लिए टूर पे आ जाते हैं। इन्सपेक्शन तो बस बहाना होता है समझे साब्जी.......।

आपका प्लान, आपका प्रोजेक्ट, रात-रात भर घिस-घिस के तैयार किया डिस्प्ले कोई काम आने का नहीं........। उनके पास आंकड़े–प्लानिंग सब मौजूद रहता है, रट के आये रहते हैं।

ये अलग बात है कि, आपको काम में लगाए रखने की, यही ऊपर वालों की टेक्नीक होती है। वे काम न परोसेंगे तो आप लोगों की बुद्धि में जंग न लग जायेगी .... ..? ऐसा उनका मानना होता है।
खाना खाईये, मजे से सोइये, सुबह–सुबह, आफिस पहुँचते ही कड़क गुड-मार्निंग बोलिए। वे आपके गुड-मार्निग बोलने के तरीके से भाँप लेंगे कि आपकी तैयारी कैसी है। फिर चाहे आप उनके, किसी भी प्रश्न के एवज दाँत निपोरें सब जायज।

साबजी, कल के लिए, आई विश यू गुड लक......इत्मीनान से ...मजे से सोइए .....और हाँ ....
बड़े लोगों को, ऐसे लोग भी अच्छे लगते हैं जो अपनी कमज़ोरियों को छुपाते नहीं, बत्तीसी निकाल के जग ज़ाहिर कर देते हैं।

चहरे पर हवाइयाँ उड़ते मातहत उन्हें अपने काम के आदमी लगते हैं।"

***

ये हर मिडिल क्लास घर के, रोज़मर्रा की बातें हैं।

पति, बड़े से बड़ा ओहदेदार हो, घर में उसकी क्लास पत्नियाँ ही लेती हैं। रहम वो बस इतना करती हैं कि, मुर्गा बना के उनका सामाजिक प्रदर्शन नहीं किया जाता।

एक और फील्ड है जिसका ज़िक्र किये बिना, दाँत-निपोरने वालों के आगे हमें दाँत-निपोरना पड़ जाएगा।

आजकल आप रोज़ टीवी में खुद देख रहे हैं। सरकार बनाने के लिए कैसे –कैसे जुगाड़ भिड़ाये जा रहे हैं। हमारे देश के कर्मठ लोग, कबाड़ में से काम की चीज़ बनाने में माहिर हैं। जुगाड़ के छकड़े गाँव–देहात में मज़े से चल निकलते हैं। इसी तर्ज में, कुछ बुजुर्ग कबाड़ी, उन देहाती विधायकों को तव्वजो देते दिख रहे हैं, जो कहीं मीडिया के एक प्रश्न झेलने के काबिल नहीं। नए-नए विधायक घेरे जा रहे हैं। घेरे जायेंगे। उनके लिए मीडिया के मार्फत, प्रलोभन का पहाड़ खड़ा किया जाता है ।

ये कबाड़िये, वो जुगाड़िये होते हैं, जो कभी खुद मेट्रिक, बी.ए., एम.ए., पास न किये मगर आलाकमान के इशारों में, बड़े-बड़े आईएएस, आईपीएस को डाँट पिला देते हैं।

अपने आप को किंग मेकर की भूमिका में फिट किये ये स्वयंभू नेता, उसी भाँति बहते हुए किनारे लगे हैं, जैसे बाढ़ में, शहर का जमा कूड़ा करकट किनारे लग जाता है।

चूँकि शास्त्र अनुसार, आत्मा अविनाशी है, विज्ञान अनुसार तत्व अविनाशी है अत; दोनों अविनाशी, नष्ट होने से बचे रहते हैं।

जनता से ऐसे झाँसे-दार वादे कर लेते हैं, जैसे ट्रेन में विदाउट टिकट चलने वाला प्रेमी अपनी प्रेमिका से कर लेता है। "मैं तेरे लिए चाँद तोड़ लाऊँगा”। सही मानो में अगर चाँद का एक पोस्टर भी ला के देने की हैसियत होती तो ट्रेन का टिकिट न लिया जाता?

ये चूहे, क़ानून की हर उस लाईन को कुतर लेते हैं जो इनके मकसद के आड़े आता है। ज़िन्दगी भर कानून के दाँव-पेचों को कुतरना इन चूहों की बाध्यता है। अगरचे, ये अपना दाँत कुतरने में इस्तेमाल न करें या, बेवज़ह न घिसें तो, इनके दाँत अनवरत बढ़ते रहेंगे।

जो, खी-खी करने में बदसूरत,

स्माइल प्लीज़ के लिए एकदम बेकार और

निपोरने में नाम पर बेडौल नज़र आयेंगे .....!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें