अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.26.2015


आदिवासी विमर्श : एक शोचनीय बिंदु

२१ सदी में तीन विमर्श बहुत वाद-विवाद के विषय रहे हैं। कुछ विमर्श राजनीति में पले बढ़े तो कुछ अपनी अस्मिता को लेकर विवादित रहे, कारण जो भी रहे हों लेकिन इन तीनों विमर्शों में जिसने मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया वो आदिवासी विमर्श है। चूँकि इसमें राजनीति के साथ-साथ अस्मिता का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है। आज आदिवासी समाज पर सैंकड़ों हज़ारों दर्शन दिए जाते है, हज़ारों की संख्या में संगोष्ठियाँ, सम्मेलन करवाए जाते है। लेकिन आदिवासियों की समस्याओं को लेकर मेरे कई साथी हस्ताक्षर कोरे पन्नों पर केवल स्याही बिखरते हैं। आए दिन नये-नये सुझाव तरीके पाठक वर्ग को सुनाते हैं। मेरे संसार का पाठक वर्ग भी कितना सहज और सरल है क्योंकि वो हमेशा आँखें मूँदा हुआ सुनता रहता है। आदिवासियों की मूल समस्याएँ क्या हैं? उनका हमारे प्रति नज़रिया क्यों ऐसा बना हुआ है? क्यों वो हमे राक्षसों की भांति समझते हैं? क्या कारण है जिसके कारण नफ़रत या देखने की एक विशिष्ट दृष्टि बन गयी है? आज इस विषय को समझना मेरे नज़रिये में ज़रूरी है।

जहाँ विज्ञान ने मंगल ग्रह पर भी अपना अधिकार कर लिया, तथा सुख-सुविधाओं का पिटारा अपने हाथ में ले लिया वहीं उसकी प्रतिस्पर्धा की भूख बढ़ती गयी। मानव का यह स्वभाव है कि वह बिना किसी स्वार्थ के कोई काम नहीं करता। उसकी नियति में ही किसी न किसी रूप में स्वार्थ छिपा होता है। आदिवासियों के साथ भी कुछ इसी प्रकार का खेल खेला गया। कभी राजनेताओं ने छला तो कभी आधुनिकता के अंधाधुंध ने। कभी फेसिलिटी के नाम पर ठगा गया तो कभी ज़ोर ज़बरदस्ती से खदेड़ा गया। आज न केवल भारत में अपितु पुरे संसार के आदिवासियों पर खतरे के बादल मँडरा रहे हैं। आज सबसे बड़ी समस्या आदिवासियों के पलायन को लेकर नहीं हैं, अपितु समस्या मेरी नज़र में ये है कि उन्हें आम नागरिकों की श्रेणी में रखा जाये या विशिष्ट श्रेणी में? अगर उन्हें आम नागरिकों की श्रेणी में रखते हैं तो आदिवासियों का सामंजस्य नहीं बैठता और अगर छोड़ते हैं तो एक जाति हमारे समाज से सदैव के लिए टूटती है। अगर मनुष्य में से आत्मा निकलती है तो शरीर मिट्टी मात्र है लेकिन यदि उसका कोई अंग अलग हो जाये तो सारी उम्र बेकार हो जाती है यही हमारे और आदिवासियों के बीच कशमकश चल रही है।

आदिवासी आज आधुनिक भारतीय राष्ट्र के सामने एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न बन खड़ा हुआ है। ये प्रश्न आज बौद्धिक हलकों को गंभीर विचार मंथन के लिए उद्वेलित किए हुए है। निस्संदेह एक सीमा तक इसका श्रेय माओवादियों को दिया जाना चाहिए। उन्होंने अपने सशस्त्र संघर्ष से भारतीय राजसत्ता को चुनौती दी है। उनका केंद्रीय आधार भले छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में हो और उनकी सघन गतिविधियों के दायरे में देश के करीब साठ अन्य जिले ही हों, लेकिन वहाँ ज़ारी हिंसा और प्रतिहिंसा की धमक सारे देश में है। संयोगवश माओवादियों के प्रभाव क्षेत्र में ज़्यादातर आदिवासी बहुल इलाके हैं। संयोग से उनमें अधिकांश खनिज संपदा से समृद्ध इलाके हैं। इसलिए बड़ी कंपनियों की उन पर निगाहें हैं, जिनसे आदिवासियों के विस्थापित होने का ख़तरा है और इससे माओवादियों को अपने संघर्ष को मौजूदा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विमर्श में एक बड़ी ढाल मिल गई है।

आदिवासियों से संबंधित समाज-वैज्ञानिक विमर्श भी कम पेचीदा नहीं है। भारत में जनजातियों की अलग से पहचान करने की शुरूआत औपनिवेशिक शासन के समय से ही शुरू हुई। सुदीप्त कविराज मानते हैं कि औपनिवेशिक शासन में सावर्जनिक विमर्श में अपना वर्चस्व कायम करने के लिए नयी कोटियों का निर्माण किया। इसने इस सिद्धांत को स्थापित किया कि राज्य को सावर्जनिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करने का प्राधिकार है। इसी मकसद से इसने नई पहचानों को बढ़ावा दिया। अंग्रेज़ों ने भारत में दस वर्ष के अन्तराल पर जनगणना की शुरूआत की, इसमें सिर्फ लोगों की गिनती ही शामिल नहीं थी, बल्कि इसके द्वारा जनसंख्या को विभिन्न श्रेणियों में भी बाँटा गया। निकोलस बीनी डिक्कर्स ने औपनिवेशिक राज्य को ‘ऐथ्नोग्राफिक स्टेट’ की संज्ञा दी है। दूसरी ओर, आंद्रे बेते मानते मानते हैं कि दुनिया के कुछ भागों में औपनिवेशिक शासन ने पुरानी पहचाने ख़त्म करने के लिए नयी श्रेणियाँ रचीं, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि जनजातियों की श्रेणी पूरी तरह से औपनिवेशिक दौर की देन है। बेते के अनुसार दुनिया के सदियों से पारस्परिक अंतर:क्रिया चलती रही है। फिर भी, अँग्रेज़ी शासन के दौरान ही जनजातियाँ स्पष्ट रूप से पृथक श्रेणी के रूप में सामने आयीं। अंग्रेज़ों ने इस श्रेणी की मदद से अपनी नीतियों को आगे बढ़ाया।1

फेलिक्स पैडेल ने ‘कोंड’ आदिवासियों में नर बलि की परम्परा को भी रेखांकित किया और बताया कि कैसे ब्रिटिश उपनिवेशवादियों और ईसाई मिशनरियों के लिए उन्हें अपने अधीन करने और उनके संसाधनों पर कब्ज़ा जमाने का माध्यम बन गई। इस पूरी कथा को आगे बढ़ाते हुए फेलिक्स पैडेल आज के दौर तक आते हैं और राष्ट्र के हित में आदिवासियों से बलि लेने की बात की व्याख्या और वर्णन करते हैं। यह एक विचारोत्तेजक और कई मायने में आँखें खोलने वाला वर्णन है। लेकिन यह संभवतः ज़्यादा विवेकपूर्ण होता, अगर ‘बलि का विमर्श’ एक बलि के अन्यायी एवं क्रूर स्वरूप को सामने लाने के लिए दूसरी बलि को उचित ठहराने की हद तक जाता नहीं दिखता। आदिवासियों से जुड़े विमर्श की यह एक बड़ी विडंबना रही है। उनसे हुए ऐतिहासिक अन्याय की बात करते हुए उनकी परंपराओं और जीवन-शैली के महिमामंडन की एक विचित्र प्रवृत्ति हावी हो जाती है। यहाँ तक कि दुनिया की सारी समस्याओं का हल आदिवासियों की जीवन-शैली में निहित बता दिया जाता है। उनके अंधविश्वास, उनके देवी-देवताओं, उनकी सामाजिक रीतियाँ, विवेक और तर्क की कसौटी पर नहीं कसे जाते और उन्हें कुछ उसी तरह पवित्र मान लिया जाता है, जैसे हिंदू परंपरा में गाय या गंगा को समझा जाता है।2

फेलिक्स पैडेल ने अंग्रेज़ों के इस दावे का ज़िक्र किया है कि उन्होंने ‘कोंड’ आदिवासियों में बलि की परंपरा ख़त्म की। इसके लिए कुछ दस्तावेज़ों का हलावा दिया है। इसके बाद बलि की धारणाओं पर सवाल उठाए हैं। पहले कहा है कि बलि की धारणा सिर्फ आदिवासियों में नहीं रही। यह हिंदू और ईसाई परंपराओं में भी उसी हद तक रही है। और उसके बाद सभ्यता की यात्रा का ज़िक्र करते हुए कहा है कि इसमें कोई बहुत बड़ी गड़बड़ी हो गई है। आधुनिक युद्धों, नाज़ियों द्वारा यहूदियों के सफाये की कोशिशए कंबोडिया, अंगोला और यूगोस्लाविया के नरसंहारों का ज़िक्र करते हुए कहा है कि इन अत्याचारों को आदिम प्रवृत्तियों का उभार कहा गया। इसके बाद सवाल उठाया है कि हम इन्हें सैकड़ों में वर्षों में विकसित हुए उन सत्ता रूपों की तार्किक परिणति क्यों नहीं कह सकते, जिनका रुझान अमानवीयकरण रहा है, जिससे मानव अस्तित्व के सारण्तत्व की बलि ली गई है।

अब इन पंक्तियों पर नज़र डालिये ‘हम मानव बलि की रीतियों को क्रूर एवं गैर-ज़रूरी अंधविश्वास से प्रेरित हत्याओं के रूप में देख सकते हैं, लेकिन इनमें कम से कम जिस मानव जीवन को लिया जाता है, उसकी पवित्रता की पुष्टि की जाती है। लेकिन बलि की शब्दावली से अलग उपरोक्त आधुनिक किस्म की हिंसा में उस पवित्रता से पूरी तरह इनकार किया जाता है। हिंसा के इसी प्रकार ने बार-बार आदिवासियों को निशाना बनाया है।

आदिवासी जन-संगठनों द्वारा और अकादमिक स्तर पर चलने वाले वाद-विवाद में इस विधेयक में कई संशोधन करने की माँग की गयी। मोटे तौर पर इसमें तीन बातोँ पर ज़ोर दिया गया। पहला गैर अनुसूचित जनजाति वनवासी समुदाय भी विधेयक में शामिल किये जाने चाहिए। दूसरा अधिकारों को मान्यता देने की आखरी तारीख़ या ‘कट ऑफ़ डेट’ को १९८० तक रखना गलत है इसे और आगे बढ़ाया जाना चाहिए क्योंकि उसके बाद भी बहुत से परिवार विस्थापित हुए हैं। तीसरा, अधिकार तय करने की प्रक्रिया में ग्रामीण सभा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, चोथा गाँवों की परिभाषा पेसा कानून में दी गयी परिभाषा के अनुसार होनी चाहिए।

आदिवासी संगठनों ने इस कानून के पक्ष में सन २००२ से ही लोगों को गोलबंद करना शुरू कर दिया था। इसी कारण, कानून बनने की प्रक्रिया की भी शुरूआत हुई। आदिवासियों के आन्दोलन एवं वामपंथी दलों के दबाव के कारण मजबूर होकर यूपीए सरकार ने १३ दिसम्बर २००५ को संसद में यह विधेयक पेश किया। यह विधयेक अप्रैल २००५ में सार्वजनिक बहस के लिए ज़ारी किये गये विधयेक से काफी मिलता-जुलता था। लेकिन इसमें संरक्षणवादियों की चिंता को दूर करने के लिए ‘मुख्य क्षेत्र’ का विचार शामिल किया गया। यह प्रावधान अप्रैल २००५ के विधेयक में मौजूद नहीं था। इसमें संरक्षित क्षेत्रों के वन्य जीवों के लिए महत्वपूर्ण ‘मुख्य क्षेत्र’ से लोगों के दूसरी जगहों पर बसाने का प्रावधान किया गया। इसके अलावा, इसमें बहुत कम बदलाव किये गए थे। इसमें आदिवासियों आंदोलनों द्वारा सुझाया गया कि कोई संशोधन शामिल नहीं किया गया था। विधेयक की विवादपूर्ण स्थिति और दूरगामी प्रभाव को देखते हुए सरकार ने इसे लोक सभा में पेश करने के बाद संयुक्त संसदीय समिति को सौंप दिया। संसद को विधेयक के सभी पहलुओं पर विचार करके यह बताना था कि इसे किस रूप में पारित किया जाना चाहिए।3

भारतीय समाज, राजनीति और साहित्य मे उत्पीड़ित अस्मिताओं की मुक्ति और संघर्षों का दौर है। बीसवीं सदी के आखिरी दशकों में भारत में नए सामाजिक आन्दोलनों का उभार हुआ। किसानों, दलितों, आदिवासियों और जातीयताओं की ‘नई एकजुटता’ ने ऐसी माँगें और मुद्दे उठाये जो स्थापित सैद्धांतिक और राजनीतिक मुहावरों के माध्यम से आसानी से समझे और सुलझाये नहीं जा सकते थे। इन समूहों ने अपने शोषण के लिए अपनी ख़ास अस्मिता को कारण बताया और उस शोषण और भेदभाव के ख़िलाफ़ संघर्ष के लिये उस संबंधित अस्मिता वाले समुदाय को साथ लेकर अपनी मुक्ति के लिए सामूहिक अभियान चलाया। चूँकि इस प्रक्रिया में शोषण और संघर्ष का आधार सामुदायिक पहचान है, इसलिये इसे अस्मितावाद की संज्ञा दी गर्इ। प्राय: इस दिशा में साहित्यिक आंदोलन ने भी बढ़-चढ कर हिस्सा लिया। साहित्य के केन्वास पर भरपूर लेखनी चलार्इ गर्इं। आदिवासियों के साथ हो रहे राजनैतिक, आर्थिक परिवेश को विभिन्न लेखकों ने अपनी कृतियों में उकेरा।

आदिवासी व्यवहार कुशल तथा प्रभावी समाज से दूर प्रायः वन्य और पर्वतीय अंचलों के सुदूरवर्ती तथा अलग-अलग बस्तियों में निवास करते हैं वे एक सुसम्बद्ध समुदाय में जीते हैं तथा उनकी संस्कृति रीतिरिवाज, विश्वास तथा भाषाएँ विशिष्ट तथा विभेदक हैं। जब सामाजिक शकितयों ने इन्हें छेड़ा नहीं था ये सूखे थे। इनका जीवन सरल अकृत्रिम तथा आदिम है इनका विचरण ही नर्तन है और इनका भाषण ही गायन है। किसी भी आदिवासी भाषा-संस्कृति और साहित्य का विकास आदिवासी समुदाय के चिरकाल तथा किसी स्थान पर स्थायी तौर पर बसने से जुड़ा है। इसके विपरीत जब आदिवासियों को उनकी भूमि से बेदखल कर दिया जाता है तो उनकी आजीविका का एकमात्र स्रोत विनिष्ट हो जाता है।

आदिवासी विमर्शकार राजाराम भादू ने भी कहा है कि "आदिवासी साहित्य के उद्धव और परिप्रेक्ष्य निर्माण में मराठी और दलित साहित्य के संबध को जोड़कर रखा गया है जो सही भी है, लेकिन आदिवासी अस्मिता और उनकी संघर्ष-धर्मी चेतना के विकास और प्रतिरोध संगठनों के निर्माण में नक्सलवादी आंदोलन की प्रेरणा प्रयासों को वहाँ लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया गया है। जबकि तेलंगाना तेभागा आन्दोलन से ही आदिवासी स्त्री पुरुषों की गोलबंदी आरम्भ हो गर्इ थी। यह प्रक्रिया नक्सलवादी श्री काकुलम दण्डकराण्यं ओर भोजपुर में आकर परवान चढ़ी और भयंकर दमन और उत्पीड़न के बावजूद आज भी आदिवासी अंचलों में फैलती जा रही है।"4

अत: निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता हैं कि आदिवासी न केवल अपनी अस्मिता के लिए ज़रूरी हैं अपितु इससे हमारे पूर्वज लोक- थाएँ भी बची हुई हैं। अगर मनुष्य जाति इसी प्रकार से अपनी प्रतिस्पर्धा की दोड़ में, केवल अपने स्वार्थ के लिए इन्हें खदेड़ने में लगी रहेगी तो हम अपनी विस्मृतियों को खो देंगे।

सन्दर्भ सूची:

१. समाज-विज्ञान कोश खंड १ , सम्पादक, अभय कुमार दुबे, प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. पहला संस्करण २०१३, पृ. सं. १२९.
२. वही पर, पृ. सं. १३२.
३. जनसत्ता, सम्पादक ओम थानवी, ७ फरवरी २०१३.
४. आदिवासी कौन- सम्पादक: रमणिका गुप्ता, प्रकाशक- राधाकृष्ण, दरियागंज, नई दिल्ली, पहला संस्करण। पृ. सं १३८.

सुरजीत सिंह वरवाल
विभाग – हिंदी
डॉ।. हरी सिंह गौर केंद्रीय विश्विद्यालय, सागर,
मध्य प्रदेश
ई मेल- singh.surjeet886@gmail.com.
दूरभाषः +919424763585/+919530002274


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें