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07.19.2014


आत्मस्वीकृति
एक सामान्य व्यक्ति के असामान्य बनने की रोचक गाथा

पुस्तक : आत्मस्वीकृति (आत्मकथा)
लेखक : नरेन्द्र कोहली
प्रकाशक : हिंद पॉकेट बुक्स,
        ई-14, सेक्टर-11,
        नोएडा-201301 (भारत)
संस्करण : जुलाई, 2014
पृष्ठ संख्या : 296
मूल्य : पेपरबैक रु. 250
सजिल्द : रु. 395

यशस्वी लोगों अर्थात सिलेब्रिटीज़ के संबंध में जनसामान्य के मन में यह धारणा रहती है कि ज़रूर वे कोई लोकोत्तर व्यक्ति होते होंगे। प्रसिद्ध स्टैंड-अप कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव ने अपनी एक प्रस्तुति में इसका अत्यंत रोचक वर्णन किया है कि किस तरह उनका प्रतिनिधि पात्र ‘गजोधर’ मुंबई से गाँव आए अपने पड़ोसी से पूछता है कि क्या वह करीना कपूर से मिला था और क्या वह ‘सब-कुछ’ उसी तरह करती है, जिस तरह हम करते हैं? राम और कृष्ण-कथाओं की सामयिक पुनर्रचना कर साहित्य-जगत में एक नई क्रांति का सूत्रपात करने वाले, आज के सबसे मूर्धन्य और लोकप्रिय कथाकार डॉ. नरेंद्र कोहली के संबंध में तो उनके प्रशंसक पाठकों की यह आम धारणा है कि वे अवश्य ही कोई संत हैं, और कोई आश्चर्य नहीं होगा, यदि उनमें से कोई यह भी सोचता हो कि ज़रूर वे किसी आश्रम में रहते होंगे और ‘तप’ करते होंगे।

हिंद पॉकेट बुक्स से नरेंद्र जी की सद्य प्रकाशित आत्मकथा ‘आत्मस्वीकृति’ इस बात की स्वीकृति है कि भौतिक अर्थों में ऐसा नहीं है और लेखक भी एक इनसान ही होता है और प्राय: उन्हीं स्थितियों से गुज़रकर आया होता है, जिनसे आम आदमी रोज़ गुज़रता है। इसमें देश के बँटवारे की त्रासदी से प्रभावित उनकी बाल्यावस्था, उर्दू में हुई प्रारंभिक पढ़ाई, हिंदी की ओर अदम्य रुझान, अभिनय और लेखन में रुचि तथा अपनी वक्तृत्व-कला से छोड़े प्रभावों, युवावस्था के आकर्षणों, उच्चतर अध्ययन के लिए दिल्ली-आगमन, होस्टल की ज़िंदगी, नौकरी की जद्दोजेहद, असफल प्रेम-प्रसंग, फिर मधुरिमा जी से संबंधों की प्रगाढ़ता और विवाह-बंधन में बँधने तक की घटनाएँ शामिल हैं। सामान्य होते हुए भी ये घटनाएँ उनके सामान्यों में भी असामान्य होने, या कहिए, सामान्य से सतत ऊपर उठते जाने के संकेत देती चलती हैं। एक सर्वथा नई शैली का इस्तेमाल करते हुए लेखक ने इसे उपन्यास की-सी रोचकता प्रदान की है। आप इसे पढ़ना शुरू करेंगे, तो फिर पूरा पढ़कर ही दम लेंगे और इस प्रश्न के साथ इसे छोड़ेंगे कि आगे क्या हुआ होगा और इसका अगला भाग कब पढ़ने को मिलेगा?


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