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12.01.2008
 

एक सवाल
डॉ. सुरेन्द्र भुटानी 


ये सितारे मुआजिरों की बस्ती के ऊपर
कितनी ख़ामोशी से टिमटिमाते रहते हैं
दूर उस पहाड़ी के पास किले से देखो
सिपाही लापरवाही से गोले बरसाते रहते हैं
मुआजिर=शरणार्थी

बस्ती और किले के बीच की दूरी में
कभी भी इक इन्सानी राह बनती नहीं
हर कोई दुश्मनी को बनाये रखता है
कभी यहाँ अब रूहानी चाह बनती नहीं
रूहानी=अध्यात्मिक

शहीद यहाँ भी होते हैं और वहाँ भी
हर मादरे-वतन के अपने चिराग़ हैं
माँ ही है जो रोती रहती है हर तरफ़
इन्सानियत के भी अजीब से दाग़ हैं
मादरे-वतन=मातृ भूमि

वक़्त की कीमत कुछ बढ़ती नहीं, क्यों
ग़ुर्बत का ही हर सू बोलबाला है
इक आवाज़ ज़मीर की निकलती नहीं क्यों
किस ने कब अपने दिल को टटोला है


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