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12.01.2008
 

अधूरापन
डॉ. सुरेन्द्र भुटानी 


राह एक रूह सी बनी है
इस भूली बिसरी कायनात की
ज़मीर भी भूला सा राही यहाँ
कितनी दूरी तय कर पायेगा हयात की
कायनात=ब्रह्माण्ड; ज़मीर=अन्तर्मन; हयात=जीवन

आँखों के अश्क़ ख़त्म हो चले
कुछ उधार की ओस रूबरू है
अपने से आज कितनी हमदर्दी है
अजब इस दिल की जुस्तजू है

मासूम इन्साफ़ गुनाहों की दुनिया में
महज़ मुहब्बत कर के बेगाना है
इक नन्ही सी कंदील जल के बुझी
ग़मे-हस्ती का अजब फ़साना है

इख़्लास दावाओं को ठुकराता रहा
मजलूमी दिल की दिल में रही
निस्बत होने की चाह में कभी
हर अधूरी चाह मुश्किल में रही
इख़्लास=पवित्रता; मजलूमी=ग़रीबी

ज़िन्दगी का यह फ़ीका सा स्वाद
और कितना ज़हर पचाना है मुझे
सुर्ख़ीये-लब कब हो जाये आज़ाद
और कितना क़हर उठाना है मुझे
सुर्ख़ीये-लब=होंठो की लाली


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