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ISSN 2292-9754

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08.24.2017


हाइकु

1. जीवन घट
कर्म जल पूरित
बुलावा आया।

2. कर्मों का फल
बिन सोचे करनी
त्रिशंकु बने।

3. धरा कुटुम्ब
सब जन अपने
यही संस्कृति।

4. लोभ न आये
देख पराया धन
बुरी बला ये।

5. पीर परायी
अपनी-सी समझे
मनुज वही।

6. निज सुख दे
परदुःख ले लेता
प्रिय सभी का।

7. चंचल मन
आकर्षक बुराई
सहज खींचे।

8. स्वयं पारखी
निज गुण ज्ञान का
आत्म मुग्ध मैं।


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