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ISSN 2292-9754

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10.20.2018


भावों का इन्द्रजाल:घुँघरी

घुँघरी (काव्य-संग्रह)
लेखिका: डॉ.कविता भट्ट
वर्ष: 2018
पृष्ठः128
मूल्यः 260 रुपये
प्रकाशक: अयन प्रकाशन, नई दिल्ली,

अनुभूति के क्षणों की चरम अवस्था में अन्तस्तल से कविता की धारा फूट पड़ती है। अनुभूति की सहज और प्रभावी अभिव्यक्ति कवि और कविता दोनों को विशिष्टता प्रदान करती है। भावों का सोता शब्दों में ढल कर कविता का रूप ले लेता है। जब कविता रूपी पुण्य-सलिला में अवगाहन कर सहृदय असीम आनंद की अनुभूति करने लगे, कवि की अनुभूति के साथ पाठक की अनुभूतियाँ तादात्म्य स्थापित कर लें, तभी कविता सार्थक है। कविता केवल वायवीय ही नहीं, यथार्थ की कलात्मक अभिव्यक्ति भी है। डॉ. कविता भट्ट के काव्य संग्रह ‘घुँघरी’ में छोटी-बड़ी अलग-अलग तरह की कविताएँ संकलित हैं। मानवीय संवेदना, सामाजिक यथार्थ, आशावादिता, प्रकृति सौन्दर्य, सात्विक प्रेम, वेदना और पीड़ा की सघनता आदि इन कविताओं की प्रमुख विशेषताएँ हैं। ‘घुँघरी’ की कविताएँ घुँघरुओं की भाँति मन में झंकार उत्पन्न कर देती हैं। जीवन के विविध अनुभवों को समेटे उनकी रचनाएँ उनकी ’कारयित्री’ प्रतिभा की परिचायक हैं। आचार्यों ने काव्य सृजन के हेतु रूप में प्रतिभा को विशेष महत्त्वपूर्ण माना है। प्रतिभा उस प्रज्ञा का नाम है, जो नित-नूतन रसानुकूल विचार उत्पन्न करती है ’प्रज्ञा नव नवोन्मेषशालिनी प्रतिभा मता।’

कवि के लिए संवेदनशील होना परमावश्यक है। मनुष्यमात्र ही नहीं, अपितु समस्त प्राणियों एवं जड़-जंगम के हर्ष-विषाद की अनुभूति करने वाला ही कवि हो सकता है। यदि वाल्मीकि घायल क्रौंच पक्षी की पीड़ा से द्रवीभूत न हुए होते, तो शायद आदि कवि न बन पाते। कवयित्री की रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत हैं। संग्रह का आरम्भ उन्होंने माँ शारदे की वंदना से किया है। यह वंदना ’स्व’ के लिए नहीं ’पर’ के लिए है। यही इस वंदना का वैशिष्ट्य है। उदात्त मनः कवयित्री घर-घर में हर्ष, बंजर भूमि में हरियाली तथा पहाड़ी पगडण्डियों पर फैले अँधेरों को दूर करके गाँव के जीवन को नया सवेरा देने की प्रार्थना करती हैं-

खोल किवाड़ हँसी के घरों में/मात बिखेर हरियाली बंजरों में
पहाड़ी पगडण्डी पर घोर अँधेरे/गाँव के जीवन में भर दे सवेरे

कवयित्री ने उजड़ते जा रहे पहाड़ी गाँवों की पीड़ा को शिद्दत से महसूस किया है। भोर की बेला में सूर्य के आगमन पर स्वागत को खुलने वाले दरवाज़े-खिड़की आज तरस रहे हैं खुलने के लिए। घर की दीवारें जो घर के सुख-दुख की मौन साक्षी थीं, आज शब्द ध्वनि सुनने के लिए व्याकुल हैं-
बन्धु सुनो तो क्या/है अनुमान तुम्हारा/हमें फिर से क्या/कोई आकर खोलेगा/घर की दीवारों से /क्या अब कोई बोलेगा

दरवाजे भी चुपचाप है/खिड़कियाँ भी हैं उदास/खुलने की नहीं बची आस

इन स्थितियों से आशावादी दृष्टिकोण की धनी कवयित्री तनिक भी निराश नहीं हैं। वर्तमान भले ही उजड़ा है, लेकिन सुनहरा अतीत भविष्य के प्रति आशान्वित करता है। समय परिवर्तनशील है, कभी न कभी हवाओं का रुख़ अवश्य बदलेगा। बन्द दरवाज़ा एक प्रतीकात्मक कविता है, जो पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ते पलायन का दर्द बख़ूबी बयान करती है। दरवाज़ों का सिसकना, दीवारों का शब्द सुनने के लिए तरसना और खिड़कियों का सुबकना आदि बहुत मर्मस्पर्शी हैं। आस की डोर थामे कविता जी आश्वस्त हैं-

पगडण्डियों से उतरती हवा/पलटेगी रुख शायद अब/धक्का देकर चरमराते हुए/पहाड़ी की ओर फिर से/खुलेगा बंद पड़ा दरवाजा/चरमराहट के संगीत पर/झूमेंगी फिर से खिड़कियाँ/घाटी में गूँजेंगी स्वर-लहरियाँ

अन्नदाता किसान दरिद्रता और अभावों में जीवन जीने को विवश रहता है। धूप-ताप, सर्दी-गर्मी की परवाह छोड़ ख़ून-पसीना एक करने वाले किसान की पीड़ा कवयित्री को उद्वेलित कर देती है। ग़रीबी और कर्ज़ के बोझ से दबा किसान आत्महत्या के लिए विवश है। आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी किसान-मज़दूर रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ‘वह धोती पगड़ीवाला’, ‘बचपन पहाड़ का’, ’क्या मेरे टूटे मकान में’, ‘बूढ़ा पहाड़ी घर’, ‘दूर पहाड़ी गाँव में’ आदि कुछ ऐसी कविताएँ हैं, जो विकास के दावों का सच उजागर करती हैं। ’वह धोती पगड़ीवाला’ का किसान लूली-लँगड़ी व्यवस्था का प्रमाण है-

हूँ मैं व्यवस्था के लँगड़ेपन का प्रमाण/त्याग रहा हूँ अब हारकर मैं/व्यवस्था की चन्द कौड़ियों में सिमटे प्राण

सदियों से उपेक्षा, शोषण और अपमान झेल रही नारी आज भी संघर्षरत है। ‘घुँघरी’ की कविताओं में पहाड़ी नारी के जीवन की पीड़ा को बख़ूबी उभारा गया है। रात-दिन कठोर परिश्रम करने वाली पहाड़ की नारी जीवन पर्यंत संघर्षरत रहती है। कोमलांगी नारी लौह सदृश बनकर पशुवत् बोझा ढोती है। वह दुनिया भर में मानवाधिकारों की गूँज से बेख़बर रहकर कर्मरत है। पीड़ा और वेदना सहती हुई घर से लेकर खेतों तक अपने को खपा रही है। नशे में डूबे पुरुष को उबारने और परिवार को बचाने के लिए शराब के ठेकों को बन्द कराने की मुहिम में भागीदार भी बनती है-

क्या लौह निर्मित है यह सिर या कमर/जिस पर पहाड़ी नारी पशुवत् बोझे ढो रही है/
नशे में झूम रहा है पुरुषत्व किन्तु/ठेकों को बन्द करने के सपने सँजो रही है/कहीं तो सवेरा होगा इस आस में/रात का अँधियारा अश्रुओं से धो रही है

आशा, विश्वास और जिजीविषा से ओत-प्रोत कविता जी को दुःख और संघर्षों से घबराकर आँसू बहाना, सिसकियाँ भरना और हार मान लेना तनिक भी पसन्द नहीं है। क्योंकि जीवट का धनी व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी कोई न कोई राह निकाल लेता है। संग्रह की रचनाएँ निराश-हताश जनों में उत्साह और ऊर्जा का संचार करने की सामर्थ्य रखती हैं। ’नई रीत लिखें अब’ कविता की पंक्तियाँ दर्शनीय हैं-

दुःख-संघर्षों से हार न मानें/वही भावाक्षर मन मीत लिखें अब/कभी हार न जाना ठोकर खाकर/पग-पग वही उद्गीत लिखें अब

कवयित्री का आशावादी दृष्टिकोण जीने की राह बताता है। वह पूरी तरह आश्वस्त हैं कि एक दिन हास की उष्मा से अवसादों की बर्फ़ अवश्य पिघलेगी। ’मैं हूँ सरस होंठों की छुवन’ ऐसे ही भावों को लेकर रची गयी है-

बर्फ़ अवसादों की थी जो/अब हँसी से गल जाएगी/उष्मा अब उन्मुक्त है/शीत-निशा ढल जाएगी

पहाड़ों के नयनाभिराम प्राकृतिक सौन्दर्य का निरूपण कविता जी ने मानवीकरण के माध्यम से किया है। प्रकृति मनुष्य की चिर सहचरी है, उसके कण-कण में विराट सत्ता का रूप झलकता है। अपने प्रवाह से घुँघरू बजाती अप्सराओं-सी नदियाँ, बर्फ़ से ढके ऊँचे-ऊँचे पर्वतों को चूमती सुरीली हवाएँ, प्रेयसी के स्पर्श-सी सुखद नरम-मुलायम धूप, वृक्षों से आलिंगनरत लताएँ, सुन्दर सीढ़ीदार खेत, प्रणयरत पक्षी युगल का मनोमुग्धकारी चित्रण उनकी कविताओं में मिलता है। कवयित्री का मन सांसारिक वैभव को त्यागकर प्रकृति सौन्दर्य में खो जाना चाहता है-

ये घुँघरू बजाती अप्सराओं-सी नदियाँ/अभिसार को आतुर ये सलोनी बदलियाँ/बर्फीले बिछौनों पर ये अनुपम आलिंगन/सुरीली हवाओं के उन्नत पर्वतों को चुम्बन
इस प्रतिध्वनि में डूब ऐसे खो जाऊँ/पद-धन-मान छोड़ बस इनमें खो जाऊँ

पूरी कविता आँखों के आगे एक शब्द चित्र-सा उकेर देती है।

बुराँस उत्तराखण्ड का राज्य वृक्ष है। गर्मियों के दिनों में ऊँची पहाड़ियों पर खिलने वाले बुराँस के लाल फूलों से पहाड़ियाँ सौन्दर्य से भर उठती हैं। बुराँस की नव कलिका उल्लास का प्रतीक है। वह एक छोटी बच्ची की तरह किवाड़ खोल कर चल पड़ती है। उसके उल्लसित मन में यह भरोसा है कि एक दिन पहाड़ी गाँव फिर से सँवर जायेंगे-

बुराँस की नई कली, किवाड़ खोलकर चली
किवाड़ गाँव के विकल /झूम कर खुलेंगे कल/अब रंग जाएँगे बदल/पहाड़ सब जाएँगे संवर

कवयित्री का मन प्रकृति प्रेमी तो है ही साथ ही अपने अंचल की लोक-संस्कृति और लोकतत्त्वों से भी उन्हें गहरा लगाव है, यही कारण है कि जब वे लोक परम्पराओं को बिखरते हुए देखती हैं, तो चिंताकुल हो उठती हैं। आज की तथाकथित आधुनिक पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत और परम्पराओं से विमुख हो रही है। यह चिंता ’फूलदेई’ जैसी कविताओं में स्पष्ट देखी जा सकती है।

कविता जी ने सौन्दर्य, प्रेम, वेदना तथा सुख-दुःख आदि भावों को प्रकृति की पृष्ठभूमि पर प्रस्तुत किया है। कवयित्री के मिलन सुख में प्रकृति भी अपना पूर्ण योग देती है। प्रेमी मन, प्रिया को पीड़ा से दूर कहीं ले जाकर सान्निध्य सुख में डूब जाना चाहता है। वासना रहित यह सात्विक प्रेम देह से परे है। प्रिय की पीड़ा दूर कर उसके जीवन में ख़ुशियाँ भरने वाला ही सच्चा प्रेमी होता है। ऐसा उदात्त प्रेम पाकर आत्मा निर्मल हो जाती है-

वासना से रहित प्रेम आलिंगन/ध्वनित हों प्रेम के अनहद गुंजन/हे प्रिया! मैं पावन गीत गाना चाहता हूँ

’घुँघरी’ की कविताओं में प्रेम का चित्रण उदात्त भाव भूमि पर किया गया है। इनमें प्रेम का ऐसा रूप चित्रित है, जिसमें त्याग और समर्पण ही सर्वोपरि है। सर्वस्व अर्पित करके, जो असीम आनन्द की अनुभूति होती है, वह अतुलनीय है। पथ को आलोकित करने वाले तथा पीड़ा से उबारने वाले प्रिय के प्रति श्रद्धा स्वाभाविक है-

न दिशा थी, न दशा थी जब संघर्ष हारा/विकट संकट से उसने हमको उस पल उबारा/उसमें अपनी श्रद्धा का कण कण लिखूँगी/प्रेम को अपना समर्पण लिखूँगी

प्रिया मन का द्वार खोले प्रतीक्षारत है। ’मैं’ का भाव लेशमात्र भी मन में कहीं नहीं है। सप्त सुरों की मधुर रागिनी के बीच गलबहियाँ डालने के लिए मंद गति से प्रियतम का आना और फिर सदा-सदा के लिए हृदय भवन में रुक जाने की कामना से पूरित नायिका का मन उत्कट प्रेम भाव से भरा हुआ है। मिलन का आकांक्षी हृदय स्वप्न में ही मिलन की अनुभूति कर लेना चाहता है-

रात्रि-प्रहर की इस स्वप्न सभा में प्रिय तुम आना/सतरंगी विश्राम-भवन से कभी नहीं जाना/ आज तक कभी मैंने मन का द्वार नहीं उढ़काया/अहं-साँकल न चढ़ाई, न ताला कभी लगाया

स्वप्न सभा में प्रिय को आमंत्रित कर कभी न जाने का कोमल आग्रह बड़ा ही मधुरिम है। प्रिय सामीप्य की कल्पना भर मन को सतरंगी भावों से भर देती है। संघर्षों पर विरामचिह्न लग जाता है। सम्पूर्ण प्रकृति प्रेम के रंग में रंगी नज़र आने लगती है। कल्पनाएँ पूर्ण होकर विश्राम की अनुभूति करने लगतीं हैं। प्रिय-मिलन में सारा अवसाद तिरोहित हो जाता है-

चूर-चूर सब अवसाद होते/वृक्ष झुरमुट, मधुर तानें, राधा-कृष्ण से रास होते/प्रिय!यदि तुम पास होते!
अन्तहीन कल्पनाओं को;विराम के आभास होते/प्रिय! यदि तुम पास होते!

डॉ. कविता भट्ट की कविताओं में गहन प्रेम, रससिक्त कर देने वाला प्राकृतिक सौन्दर्य, भावानुकूल अभिव्यक्ति, हृदय में पीर उठा देने वाली व्याकुलता तथा सात्विक प्रेम की धार में निमग्न कराने की अद्भुत शक्ति है। किसी भी रचना की सफलता संप्रेषणीयता पर निर्भर करती है, कविता जी की रचनाओं का यह प्रधान गुण है। आपकी क्षणिकाएँ, ताँका तथा चोका भी अद्भुत भाव -सामर्थ्य लिये हुए हैं। कम शब्दों में भावों को गुम्फित कर देने की कला में आप सिद्धहस्त हैं। किसान, आकाश, पतझर जैसे प्रचलित प्रतीकों के साथ-साथ आपने पुस्तक, बुक रैक, मॉडर्न पाठक आदि नवीन प्रतीकों के माध्यम से संबंधों में बढ़ती दूरियों का प्रभावी चित्रण किया है-

प्रिय वियोग के पतझर में/जीवन वृक्ष से निरंतर/पत्तों-सी झरती रही/आशा और प्रतीक्षा/प्रेम-वसंत की मृगतृष्णा में।
हे प्रिय!/पुस्तकालय की पुस्तक-सी मैं/शीशे की सुन्दर बुक रैक में कैद/तुम मॉडर्न युग के पाठक से/पूरा संसार लिये मोबाइल हाथ में/किन्तु, मेरे चेहरे पर लिखे/शब्दों को पढ़ना तो दूर/मुझ पर पड़ी धूल भी नहीं झाड़ते!

भाव और शिल्प के सुन्दर योग से सज्जित आपकी कविताएँ अत्यंत प्रभावशाली बन पड़ी हैं। विषय-वैविध्य के कारण रोचकता आद्योपान्त बनी रहती है। उत्तम काव्य की विशेषताओं से युक्त ‘घुँघरी’ काव्य-संग्रह साहित्य जगत में विशेष स्थान पाने का अधिकारी है।

सपर्क: डॉ. सुरंगमा यादव,
असि. प्रो. हिन्दी,
महामाया राजकीय महाविद्यालय महोना,
लखनऊ
e-mail: dr.surangmayadav@gmail.com


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