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03.22.2008
 

आस्तीनों मे साँप हैं ज़हर पचाना सीखिए
सुनीता ठाकुर


आस्तीनों मे साँप हैं ज़हर पचाना सीखिए
विश्वास के काबिलों में विश्वास बचाना सीखिए

वो ख़ामोश हो जाए हैं मेरी बेबाकी से
ज़माना जताए है, ख़ामोश हो जाना सीखिए

सुर्ख़ आँखों में फ़ख़्र धरना दे बैठी
थकी हुई नींद में ख़्वाब जगाना सीखिए

हूक सी सीने में उठने मत दीजिएगा
सीनों पे पत्थरों के शहर उगाना सीखिए

साँसों पर बोझ बनने लगे ज़िन्दगी जब
ख़ुदी से बेख़ुदी की क़समें खाना सीखिए।


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