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02.22.2014


ज़रा बता

है कुछ न कुछ तो छिपा आँखों में तेरी
ख़ुशी या ग़म कोई इतना तो ज़रा बता

क्यों है डूबी आँखें तेरी इन मोतियों में
खोया या पाया कुछ मुझ को ज़रा बता

गुफ़्तग़ू कर ले आओ ज़रा बैठ कर
सिवा तेरे और क्या जहां में ज़रा बता

सवाल क्यों करती रहती है तेरी ये आँखे
उफ़्फ़! मिटा शक कभी तेरा तू ज़रा बता

दुहाई दे रहा हूँ पास तो आ मेरे ज़रा
यकीन नहीं यूं शक की वजह ज़रा बता

इजहार क्यों नहीं लबों पे मेरे प्यार का
मुझसा जुनूं क्यों नहीं तुझ में ज़रा बता

हिरनी सी दौड़े हैं तन में यूँ न देखिये
क्या है ऐसा नज़रों में तेरी मुझे ज़रा बता


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