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| 05.18.2009 |
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ज़रा बता |
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है कुछ न कुछ तो छिपा आँखों में तेरी क्यों है डूबी आँखें तेरी इन मोतियों में गुफ़्तग़ू कर ले आओ ज़रा बैठ कर सवाल क्यों करती रहती है तेरी ये आँखे दुहाई दे रहा हूँ पास तो आ मेरे ज़रा इजहार क्यों नहीं लबों पे मेरे प्यार का हिरनी सी दौड़े हैं तन में यूँ न देखिये |
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