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ISSN 2292-9754

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04.29.2015


फीचर लेखन : साहित्य और पत्रकारिता सुंदर समन्वय

फीचर लेखन यह सृजनात्मक लेखन की एक महत्त्वपूर्ण एवं विशिष्ट विधा है। आधुनिक पत्रकारिता की सबसे लोकप्रिय विधा के रूप में फीचर ने अपनी विशिष्ट जगह बना ली है। किसी भी पत्र-पत्रिकाओं में समाचार, लेख, फीचर और चित्र यह चार अंग होते हैं। इन सभी में फीचर विशिष्ट होते हैं और पत्र-पत्रिकाओं को विशिष्टता प्रदान करनेवाले होते हैं। इसका स्वरूप लेख और समाचार से भिन्न होता है। फीचर का आधार समाचार होता है लेकिन समाचार फीचर नहीं होता। फीचर में किसी भी समसामयिक घटना. विषय, वस्तु, स्थिति या व्यक्ति के संदर्भ में तथ्याश्रित जानकारी को रोचक एवं मनोरंजक ढंग से पाठकों तक पहुँचाया जाता है। डेनियल आर. विलियम ने अपने ग्रंथ फीचर रायटिंग फार न्यूज़ पेपर्स में लिखा है। "फीचर ऐसा रचनात्मक तथा कुछ–कुछ स्वानुभूतिमूलक लेख है जिसका गठन किसी घटना, स्थिति अथवा जीवन के किसी पक्ष के संबंध में पाठक का मूलत: मनोरंजन करने एवं सूचना देने के उद्देश्य से किया गया है।”1

प्रत्येक संपादक कि यह इच्छा होती है की उसका पत्र या पत्रिका अधिक से अधिक लोगों द्वारा पढी जाए। इसलिए आवश्यक है कि उसमें रुचिकर, ज्ञानवर्धक एवं विश्वसनीय सामग्री प्रकाशित की जाए। फीचर इसी उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होते हैं। इसमें किसी भी सूचना अथवा समाचार को यथातथ्य रूप में नहीं रखा जाता। फीचर लेखक अपनी कल्पनाशक्ति और लेखन कौशल के बल पर समाचारों में निहित तथ्यों को कथात्मक रूप में प्रस्तुत करता है, जिससे पाठक पढ़ने में अधिक रुचि दिखाता है। इसके लिए विषय की कोई सीमा नहीं होती। दृष्य–अदृष्य जगत् के किसी भी विषय पर फीचर लिखा जाता है। विविध क्षेत्रों, दिशाओं, विषयों एवं संदर्भो को केन्द्रस्थ कर फीचर में सत्य एवं कल्पना का अद्भुत मिश्रण किया जाता है।

फीचर का उद्देश्य मात्र घटना एवं व्यक्ति संबंधी जानकारी देना नहीं है। सरल, सहज व मनोरंजक शैली में लिखा फीचर जहाँ पाठकों के लिए ज्ञानवर्धक होता है, वहीं नवीन सूचनाएँ, जानकारियाँ देकर मार्गदर्शन भी करता है। देश-विदेश की स्थिति, सामाजिक परिवेश, घटना, उपयोगी संदर्भ, स्थिति आदि का दस्तावेज़ी ब्यौरा भी फीचर के ज़रिए प्राप्त हो सकता है।

फीचर के माध्यम से पाठक को अतीत, वर्तमान एवं भविष्य से संबंधित महत्वपूर्ण एवं सिलसिलेवार जानकारी प्राप्त होती है। इस संदर्भ में डॉ. संजीव भानावत लिखते हैं "फीचर वस्तुत: भावनाओं का सरस, मधुर और अनुभूतिपूर्ण वर्णन है। फीचर लेखक गौण है। वह एक माध्यम है जो फीचर द्वारा पाठकों की जिज्ञासा, उत्सुकता और उत्कंठा को शांत करता हुआ समाज की विभिन्न प्रवृतियों का आकलन करता है। इस प्रकार फीचर में सामाजिक तथ्यों का यथेच्छ समावेश तो होता ही हैं, साथ ही वह अतीत की घटनाओं तथा भविष्य की संभावनाओं से भी जुडा रहता हैं। समय की धडकने इसमें गुंजती हैं।”2

फीचर में निहित सत्यता, रोचकता, भावनात्मकता, कल्पनात्मकता, उद्देश्यपूर्णता आदि ऐसे गुण हैं जो इसे साहित्यिक विधा के निकट रखते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि आधुनिक समाज में साहित्य की विविध विधाओं से जो अपेक्षाएँ की जाती हैं, फीचर उसे बहुविध ढंग से पूरा करने में समर्थ विधा है। आज कुछ लोग इसे पत्रकारिता की नवीनतम विधा के रूप में स्वीकार करते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि हिंदी पत्रकारिता के लिए यह नवीन विधा नहीं है। भले ही संज्ञक रूप में ही इसे प्रारंभिक सम्बोधन न मिला हो। "हिंदी पत्रकारिता के जन्म के साथ ही किसी न किसी रूप में यह विधा विद्यमान रही है।”3

हिंदी मे फीचर लेखन का आरंभ भारतेन्दु काल से ही माना जा सकता है। इस युग की हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के अधिकांश संपादक साहित्यकार ही थे। वे अपनी पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से समाज जागृति एवं राष्ट्रीयचेतना के साथ-साथ समसामयिक घटना, स्थिति, विषय, वस्तु एवं परिवेश के प्रति पाठकों की रुचि बढ़ाने के लिए रोचक और लालित्यपूर्ण शैली में लेख एवं निबंध लिखा करते थे। उनके यह लेख अथवा निबंध दृष्यमान जगत के विभिन्न अंग-उपांग, सूचनाओं एवं घटनाओं को प्रस्तुत करते थे, जिससे पाठकों की ज्ञानवृद्धि के साथ-साथ उनकी जिज्ञासा भी शांत हो जाती। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि भारतेन्दुयुगीन पत्र-पत्रिकाओं में लिखे गए इस तरह के लेख और निबंधों का जो उद्देश्य था वही कमोबेश मात्रा में आज के फीचर का रहा है। इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि फीचर विधा का जन्म निबंध की कोख से हुआ है।

"साहित्य में लेख निबंध का पर्यायवाची शब्द है और फीचर निबंध का ही एक रूप है।”4 आज ‘निबंध’ और ‘फीचर’ दोनों विधाएँ स्वतंत्र रूप से अपने-अपने क्षेत्र में विकसित हो रही हैं। लेकिन दोनों विधाओं की अधिकांश विशेषताएँ एक दूसरे से मिलती-जुलती हैं। कुछेक विद्वानों की परिभाषाओं से यह समानता अधिक स्पष्ट की जा सकती है। जैसे फ्रान्सीसी साहित्यकार माँटेन ने निबंध के बारे में कहा है "यह विचारों, उद्धरणों और कथाओं का संमिश्रण है।”5 इसी बात को स्वीकारते हुए एस.सी. बेंझन कहते है "इसका संबंध किसी विनोदी विषयवस्तु से होना चाहिए। निबंधकार का प्रमुख आकर्षण एक ऐसे व्यक्तित्व के प्रकाशन में निहित है जिसमें सुरुचिपूर्ण तर्क के साथ विनोद एवं मनोरंजक तत्वों का समावेश इस प्रकार से किया गया हो कि पाठक उल्लेखित बातों को परम आत्मीय एवं घनिष्ठ मित्र की भाँति ग्रहण कर सके। विषय वस्तु हृदययंगम करने में उन्हें तनिक भी असुविधा न हो।”6 डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त भी इस बात को स्वीकार करते हुए कहते हैं-

"साहित्यिक निबंधों में विचारों का प्रतिपादन करते हुए भी उसमें भावोत्तेजना की क्षमता होनी आवश्यक है। निबंधों में भावोत्तेजना का यह गुण तभी आ सकता है जबकि इसमें रचयिता के व्यक्तित्व का प्रकाशन हो और उनकी शैली में रोचकता हो।”7 इस संदर्भ में हिंदी के मानक निबंधकार डॉ. गुलाबराय का कहना है कि "निबंध उस गद्य रचना को कहते हैं, जिसमें सीमित आकार के भीतर किसी विषय का वर्णन या प्रतिपादन एक विशेष निजीपन, स्वच्छंदता, सौष्ठव और सजीवता तथा आवश्यक संगीत और सम्बद्धता के साथ किया गया हो"8

उपरोक्त परिभाषाओं में कथात्मकता, संक्षिप्तता, स्वच्छन्दता, भावोत्तेजना, सजीवता, मनोरंजकता, विनोदात्मकता आदि ऐसे गुण हैं जो फीचर के अनिवार्य तत्व हैं।

निबंध और फीचर विषयवस्तु की दृष्टि से भी बहुत पास-पास के लगते हैं। विषय की स्वच्छन्दता दोनों को है, उसमें कोई सीमा रेखा नहीं है। दृश्य-अदृश्य जगत् के किसी भी विषय पर निबंध और फीचर लिखे जा सकते हैं। निबंध और फीचर दोनों विधाओं में लेखक का व्यक्तित्व उसके निजीपन के रूप में उभरता है। अर्थात् व्यक्तित्व का प्रकाशन निबंध की भी विशेषता है और फीचर की भी।

"फीचर और निबंध में जो एक पतली रेखा दिखाई पड़ती है, वह है समयानुकूल या समसामयिक का होना। समसामयिक या प्रसंगानुकूल विषय पर लिखे फीचर को ही उत्कृष्ट फीचर की कोटि में रखा जा सकता है। परंतु यह बात निबंध पर भी उतनी ही लागू होती है। जो निबंध अपने आपको समयानुकूल नहीं रख सका वह इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा। उसे इतिहास के गर्भ से निकलकर तुलनात्मक और समयानुकूल अध्ययन कर परिवर्तित करना ही होगा।"9

इस तरह विद्वानों के मत और अन्य वर्णन विवरण के आधार पर लेख, निबंध और फीचर को अलग-अलग देखना कठिन है। निबंध के तत्व, गुण एवं विशेषताएँ लगभग फीचर से मिलती-जुलती होने के कारण ही हम फीचर की उत्पत्ति निबंध विधा से मानते हैं। आज निबंध आधुनिक गद्य साहित्य की विकसित विधा है। और फीचर पत्र-पत्रिकाओं की विशिष्ट और लोकप्रिय विधा है। तीव्र-गति से बदलते परिवेश ने साहित्य और पत्रकारिता को भी प्रभावित किया है, जिससे ये दोनों विधाएँ अपने-अपने स्तर पर अपने स्वरूप और शिल्प की दृष्टि से हो गई हैं।

आरंभिक हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में साहित्यिक रचनाओं के विवेचन के साथ-साथ समसामयिक विषयों पर भी अधिकतर लेखन किया जाता था। कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र चंद्रिका, हिंदी प्रदीप, ब्राह्मण, भारतमित्र, आनंदकादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में विविध विषय पर रोचक शैली में फीचरनुमा निबंध लिखे जाते थे। राजनीतिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विषय से संबंधित फीचर मिलते हैं। जैसे-जैसे पत्र-पत्रिकाओं के स्वरूप और शिल्प में परिवर्तन होता रहा वैसे वैसे फीचर के क्षेत्र में भी विज्ञान, शिक्षा, पर्वोत्सव, पर्यटन, प्रकृति, कृषि, मानवीय रुचि विषयक आदि जीवन के विविध पहलुओं को लेकर भी फीचर लिखे जाने लगे।

आज फीचर पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण अंग बन गया है। अब हमें रोज़ के समाचारपत्रों में विभिन्न विषयों पर लिखे चटपटे, रोचक, हास्य व्यंग्यात्मक फीचर पढ़ने के लिए मिलते हैं। दिन-ब-दिन पाठकों का फीचर की ओर बढ़ता हुआ आकर्षण देखकर समाचार लेखन में भी फीचरीकरण की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। आज हर अखबार फीचर संपादक नियुक्त कर रहे हैं। फीचर परिशिष्टों के पन्ने बढ़ाए जा रहे हैं और उन्हें ज़्यादा रंगीन, आकर्षक और सजीव छवि में ढाला जा रहा है। आज इसका विषय क्षेत्र भी अत्यंत व्यापक बन गया है। कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि, सामाजिक समस्या, पर्व-त्योहार, संस्कृति, विज्ञान, पर्यावरण, पर्यटन, खेलकूद, फ़ैशन, स्वास्थ्य, सिनेमा आदि विभिन्न विषयों पर फीचर लिखे जा रहे हैं। पाठकों को मोहित एवं प्रभावित करने वाली यह विधा अब प्रिंट मीडिया तक ही सीमित नहीं रही है, रेडियो, टेलीविजन और इंटरनेट पर भी इसने धूम मचायी है। फीचर लेखन में रुचि लेने वालों की संख्या दिन-ब-दिन भी बढ़ रही है चूँकि फीचर लेखन में लेखकों को आर्थिक लाभ के साथ-साथ सामाजि प्रतिष्ठा भी मिलती है। अतः कहा जा सकता है कि आनेवाले दिनों में फीचर विधा का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है।

संदर्भ ग्रंथ –

1. संपा-अमरेंदु कुमार हिंदी पत्रकारिता:एक परिदृश्य पृष्ठ 46
2. एन.सी. पंत मीडिया लेखन के सिद्धांत पृष्ठ 110
3. विजय कुलश्रेष्ठ फीचर लेखन पृष्ठ 01
4. रत्नेश्वर फीचर टाईम्स पृष्ठ 06
5. संपा-लक्ष्मीनारायण सुधांशु हिंदी साहित्य का बृहद इतिहास (भाग 13) पृष्ठ 50
6. रत्नेश्वर फीचर टाईम्स पृष्ठ 05
7. वही पृष्ठ 05
8. वही पृष्ठ 05
9. वही पृष्ठ 07

डॉ. सुनिल डहाळे
(सहायक प्राध्यापक)
हिंदी विभाग
विनायकराव पाटील महाविद्यालय,
वैजापूर-४२३७०१
जि. औरंगाबाद, (महाराष्ट्र)
मो. ९४२२२३८६५९


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