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ISSN 2292-9754

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02.23.2015


साक्षात्कार
'प्रेम एक स्थायी भाव और अनिवार्य जीवन-शर्त है'
डॉ. दामोदर खड़से

 [दो उपन्यास, पाँच कहानी संग्रह, दो संस्मरणात्मक ग्रंथ, पाँच कविता संग्रह, चार राजभाषा विषयक पुस्तकों के वरिष्ठ रचनाकार तथा महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी के कार्याध्यक्ष डॉ. दामोदर खड़से जिनकी पन्द्रह पुस्तकें मराठी से और एक पुस्तक अंग्रेज़ी से अनूदित एवं प्रकाशित हुई हैं, किसी भी परिचय के मोहताज नहीं हैं। हिन्दी साहित्य के आकाश में अपनी गंभीर कविताओं और सशक्त कहानियों के बल पर पाठकों के दिलों में अपनी एक खास जगह बनाने वाले डॉ.दामोदर खड़से न केवल मराठी भाषा अपितु हिन्दी भाषा पर भी पूर्ण रूप से अपना दखल रखते हैं। भाषा के संवर्धन के लिए कृत संकल्प डॉ. साहब अब तक दूर-दराज़ क्षेत्रों में कई सफल आयोजन कर चुके हैं। उनके बहुआयामी लेखन के आधार पर ही उन्हें महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश की साहित्य अकादमियों और केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, भारत सरकार सहित कई संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया। संप्रति सद्स्य, केन्द्रीय हिन्दी समिति भारत सरकार। सदस्य हिन्दी सलाहकार समिति, रेल मंत्रालय, भारत सरकार। पूर्व सहायक महाप्रबन्धक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र। सुमीता केशवा (प्रवीण) द्वारा लिया गया डॉ. दामोदर खड़से जी का साक्षात्कार]
सुमीता - डॉ. खड़से जी जहाँ तक महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी का सवाल है अकादमी अपने आधारभूत उद्देश्य साहित्य की प्रोन्नति के लिए केन्द्र व राज्यों द्वारा निर्धारित योजनाओं को यथारूप क्रियान्वित कर रही है। आकादमी के कुशल संचालन एवं गतिविधियों को लेकर आप क्या कुछ कहना चाहेंगे ?
डॉ. दामोदर खड़से - महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी महाराष्ट्र में हिन्दी साहित्य और भाषा के संवर्धन के लिए कृत संकल्प है। सरकार के सहयोग से अकादमी का यह प्रयास होता है कि विभिन्न योजनाओं को सुचारू रूप से संचालित किया जा सके। वर्ष २९१२-१३ में अकादमी ने पूरे राज्य के दूर-दराज़ के इलाकों तक २३ कार्यक्रमों के आयोजन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की। साथ ही, राज्य के रचनाकारों की कृतियों को प्रोत्साहित करने की दिशा में हर वर्ष पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं।
सुमीता - अपने स्थापना काल सन १९८२ से अब तक के सफ़र में हिन्दी साहित्य अकादमी में क्या-क्या बदलाव आए हैं?
डॉ. दामोदर खड़से -  हिन्दी साहित्य अकादमी अपने स्थापना काल से हिन्दी की विकास यात्रा में जुटी है। समय के साथ कई नई योजनाएँ कार्यान्वित हुईं और नई योजनाओं की पहल होती रही है।
सुमीता -  डॉ. साहब मराठी भाषी होते हुए भी हिन्दी भाषा में आपका सामानाधिकार है। आपने कई मराठी उपन्यासों का हिन्दी में अनुवाद किया है। साहित्य के प्रचार प्रसार में योगदान के लिए आपको कई राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय पुरस्कार भी मिले। क्या आप अपने लेखन से संतुष्ट हैं?
डॉ. दामोदर खड़से -  कोई भी लेखक जब अपने लेखन से [अब तक के] संतुष्ट हो जाता है, तो उसका अपना श्रेष्ठ लेखन हो नहीं पाता। मैं इसका अपवाद नहीं हूँ।
सुमीता -  आप हिन्दी व मराठी दोनों भाषाओं में सृजनशील हैं। कविता, कहानी व उपन्यास जैसी विधाओं के लेखन के साथ ही आपके ऊपर ज़िम्मेदारी भरा पद भी है। आप अपने साहित्य संसार में इन सबके बीच कैसे तालमेल बिठा लेते हैं?
डॉ. दामोदर खड़से -  ज़िम्मेदारी का पद और लेखन के बीच तालमेल का प्रश्न हमेशा रहता है। मैं पहले भी एक राष्ट्रीयकृत बैंक में सहायक महाप्रबन्धक के रूप में कार्यरत था। लेकिन मैं यह अनुभव करता हूँ कि लेखन, लेखक को उर्जा देता है। ज़िम्मेदारियों का वहन अनिवार्यत: करना ही होता है। लेकिन यदि लेखन निरंतर जारी रहता है तो लेखक के लिए एक अदभुत संतुष्टि मिलती है। परिणामस्वरूप मैं नौकरी में रहते हुए ३८ पुस्तकें पूरी कर सका।
सुमीता -  डॉ. साहब ३८ पुस्तकें पूरी कर लेना अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। मैं आपके उपन्यास, 'काला सूरज', जो काफी चर्चित रहा और जिसके लिए आपको राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित भी किया गया, कृपया इस उपन्यास के विषय वस्तु पर प्रकाश डालें?
डॉ. दामोदर खड़से -  'काला सूरज' उपन्यास पत्रकारिता, पूंजीवाद और सामाजिक विसंगतियों के बीच संत्रस्थ एक ऐसे युवक की दास्तान है, जो व्यवस्था से जूझते हुए एक दिन स्वयं ही व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है। घर-परिवार समाज और पत्रकारिता की भीतरी कथा इस उपन्यास की कथावस्तु है।
सुमीता -  हिन्दी बाज़ार की भाषा होने की वज़ह से विदेशों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी के अध्ययन अध्यापन एवं प्रशिक्षण का कार्य हो रहा है। इसके विपरीत हमारे देश में हिन्दी के बजाए अंग्रेज़ी को काम-काज की भाषा बनाने पर ज़ोर दिया जा रहा है। इस विरोधाभास पर आप क्या कहना चाहेंगे?
डॉ. दामोदर खड़से -  बाज़ार में, भारत में भी हिन्दी है। तमाम विज्ञापनों की भाषा हिन्दी ही है। बाज़ार हिन्दी से चलता है। लेकिन, उच्च शिक्षा और नौकरी को लेकर हिन्दी के प्रति सरकार की उपेक्षा है। परिणाम स्वरूप सामाजिक रूप में सामान्य व्यक्ति अंग्रेज़ी को रोज़गार की भाषा मान बैठा है। हिन्दी को रोज़गार के साथ जोड़ने पर हिन्दी भी सामाजिक रूप में प्रभावकारी हो सकती है।
सुमीता -  जी डॉ. साहब, बिल्कुल सही कहा है आपने। बाज़ारवाद एवं वैश्वीकरण के प्रभाव के कारण हिन्दी भाषा में परिस्थितिजन्य बदलाव भी हो रहा है। हिन्दी भाषा अब ठस्स साहित्यिक भाषा नहीं रह गई। फलस्वरूप भाषा में भी परिवर्तन होना लाज़मी है। शुद्ध साहित्यिक हिन्दी भाषा को लेकर शुद्ध साहित्यिक खेमों में खलबली मची हुई है। इस बारे में आपके क्या विचार हैं?
डॉ. दामोदर खड़से -  बाज़ारवाद और वैश्वीकरण के प्रभाव के कारण हिन्दी का प्रसार देश से बाहर निश्चित तौर पर हो रहा है। विदेशों में विभिन्न भाषा-भाषी भारतीयों को एक मंच पर जोड़ने का काम हिन्दी कर रही है। व्यवहार, संपर्क मीडिया की भाषा हिन्दी है। हिन्दी, साहित्य के साथ जनसंचार, फिल्म और सीरियल के माध्यम से देश-विदेश में लोकप्रियता हासिल कर रही है। दूसरे भाषा सतत परिवर्तनशील होती है। समय के साथ जो भाषा बदलती रहती है, वह कालजयी होती है। हिन्दी अत्यंत लचीली भाषा है, उसमें तमाम परिवर्तनों को आत्मसात करने की आंतरिक शक्ति है। भाषा स्वयं अपना स्वरूप निखारती रहती है।
सुमीता -  बदलती भाषा से ही जुड़ा एक सवाल और डॉ. साहब कि नए रचनाकारों द्वारा नए शिल्प, कथ्य, कहानी व भाषा को लेकर जो नए-नए एक्सपेरिमेन्ट किए जा रहे हैं उसको लेकर साहित्य जगत में नाराज़गी दिखलाई पड़ रही है। इसको लेकर आप कितने उदार हैं बतलाएँ?
डॉ. दामोदर खड़से -  शिल्प, भाषा, कथ्य और विषय को लेकर नई पीढ़ी, एक नया प्रयोग करती है तो इसका स्वागत होना ही चाहिए।
सुमीता -  हिन्दी साहित्य की वर्तमान आलोचना के संबंध में आपके क्या विचार हैं?
डॉ. दामोदर खड़से - हिन्दी साहित्य की वर्तमान आलोचना को और सटीक और वस्तुनिष्ठ होना चाहिए। व्यक्तिनिष्ठ होने से बचना चाहिए।
सुमीता -  डॉ. साहब आज साहित्य में स्त्री विमर्श पर काफी कुछ लिखा पढ़ा जा रहा है। क्या वाकई स्त्री विमर्श से समाज में बदलाव आया है? जबकि देखा जाए तो आज महिलाओं का खुलेआम शोषण हो रहा है। स्त्री विमर्श केवल किताबी चीज़ बनकर रह गई है। इस पर आपकी क्या राय है?
 डॉ. दामोदर खड़से - स्त्री-विमर्श से समाज का ध्यान तो इस विषय की ओर गया है। यह विषय नया तो नहीं है, लेकिन केन्द्र में रहने से विषय, समाज में ऊहापोह तो पैदा करता ही है। 'निर्मला' जैसा उपन्यास प्रेमचंद ने दशकों पहले लिखा। और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं। परन्तु यह भी ध्यान रहे कि स्त्री-विमर्श केवल देह-केन्द्रित न रह जाए। केवल स्त्री केन्द्रित के नाम पर 'बोल्ड लेखन' तक सीमित न हो जाए। बल्कि ऐसे लेखन से पुरुष प्रधान समाज का स्त्री की ओर देखने के नज़रिये में परिवर्तन हो सके, ऐसी कृतियों का निर्माण होना चाहिए।
सुमीता -  साहित्यिक क्षेत्र में खेमेबाजी का चलन किसी से छिपा नहीं है। खासकर बुद्धिजीवियों के बीच बेतुकी बहस ने साहित्यिक आतंकवाद छेड़ दिया है। क्या इससे साहित्य जगत का नुकसान नहीं हो रहा है?
डॉ. दामोदर खड़से -  खेमेबाजी से किसी का लाभ नहीं होता।
सुमीता -  हमारा युवा वर्ग अंग्रेज़ी बोलने की छुतहा बिमारी से ग्रस्त है। इसलिए भी साहित्य उनसे अछूता है। युवा अपनी जड़ों की ओर लौटें। ये तभी संभव होगा जब युवा साहित्य से जुड़ें। ये कैसे संभव होगा अपनी राय दें?
डॉ. दामोदर खड़से -  युवा वर्ग को साहित्य से जोड़ने का प्रश्न आज के बहु-माध्यमों के दौर में आसान नहीं है। लेकिन, यदि साहित्य-कृति में एक ऐसा प्रवाह और प्रभाव है, जो समाज को जकझोरने में समर्थ है तो युवा वर्ग अपने आप उसमें खिंचा चला जाता है। युवा-वर्ग, जो पढ़ा-लिखा है, वह अंग्रेज़ी के अधिक करीब लगता है, यह सच है। क्योंकि वह अंग्रेज़ी माध्यम से उच्च शिक्षा ग्रहण कर रोज़ी-रोटी से जुड़ा है। यह लंबी बहस की माँग करता है। हिन्दी माध्यम से शिक्षा ग्रहणकर यदि अच्छी रोज़ी-रोटी मिलती है तो लोगों से अंग्रेज़ी का मोह जाता रहेगा।
 सुमीता - आजकल ज़्यादातर बोल्ड कहानियाँ लिखी जा रही हैं। अपितु पढ़ी और सराही भी जा रही हैं। आप क्या सोचते हैं इस बारे में?
डॉ. दामोदर खड़से -  'बोल्ड' कहानियाँ तत्कालिक आकर्षण हासिल करती हैं, लेकिन आधुनिक जीवन की गुत्थियाँ भी यदि सुलझती हैं तो उनकी सार्थकता कही जा सकती है।
सुमीता -  डॉ. साहब आज हिन्दी पाठकों की कमी चिन्ता का विषय हो गया है। जो लिख रहे हैं वे ही पाठक भी हैं। यह हिन्दी साहित्य के भविष्य के लिए चिन्ता का विषय नहीं है क्या?
डॉ. दामोदर खड़से -  पाठकों की कमी सभी भाषाओं में है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया के कारण अधिकांश लोग 'दर्शक' हो गये हैं। लेकिन, अच्छी कृतियों के पाठक आज भी हैं। 'कितने पाकिस्तान' के कितने ही संस्करण निकले। ऐसे ही, कितनी ही कृतियाँ को पाठकों ने सराहा है। बहुत निराश होने की आवश्यकता नहीं लगती।
सुमीता -  एक समय था जब अनारकली, हीर रांझा, सोहनी महिवाल एवं रोमियो जूलियट जैसी प्रणय कथाएँ सच्चे प्रेमियों के लिए आदर्श हुआ करती थीं। आज की प्रणय कथाएँ क्या जनमानस पर असर कर पाई हैं?/ आज के साहित्य में प्रणय कथाओं को आप किस स्तर पर देखते हैं? क्या प्रणय कथाओं का अस्तित्व खतरे में दिखलाई पड़ता है?
डॉ. दामोदर खड़से -  प्रणय हर काल में रहा है और रहेगा। इसके माध्यम बदलते रहते हैं। समाज का कसाव आज इस विषय को लेकर उतना नहीं रहा है। जाति, धर्म, भाषा को लेकर, प्रेम और विवाह के लिए पहले की तरह बंदिशें नहीं रहीं, इसलिए इसकी तीव्रता पहले की तरह नहीं लगतीं। अब इसके नये आयाम खुल गए हैं। विश्व समुदाय में प्रेम, प्रणय और विवाह से जुड़ी कहानियाँ आज भी लिखी जा रही हैं। प्रेम एक स्थायी भाव और अनिवार्य जीवन-शर्त है; जीवन से इसका अस्तित्व कभी नहीं मिट सकता।
सुमीता -  किन साहित्यकारों की लेखनी ने आपको प्रभावित किया है?
 डॉ. दामोदर खड़से -  कुछेक का उल्लेख करके कइयों को बिसरा देना उचित नहीं।
सुमीता -  आज के साहित्य लेखन के विषय में कुछ बतलाएँ?
डॉ. दामोदर खड़से -  आज का लेखन संभावनाओं से भरा हुआ है। उदयप्रकाश, शिवमूर्ति, बलराम, संजीव जैसे लेखकों ने अपने समय को अपनी तरह से रेखांकित किया है।
सुमीता -  २०१२ में आपका 'संपूर्ण कहानियाँ' संग्रह प्रकाशित हुआ। जिसकी काफी चर्चा हुई। आजकल क्या लिख रहे हैं बतलाएँ?
डॉ. दामोदर खड़से -  आजकल एक उपन्यास पर काम कर रहा हूँ।
सुमीता -  हाल ही में आपके कृतित्व और व्यक्तित्व पर 'कागज़ की ज़मीन पर' किताब प्रकाशित हुई है। देश भर के प्रतिष्ठित रचनाकारों ने आपके बारे में खुले दिल से लिखा है। यह अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। इस उपलब्धि को आप किस तरह से देखते हैं?
डॉ. दामोदर खड़से - 'कागज़ की ज़मीन पर' में लेखकों का स्नेह मिला। सुखद लगा; ज़िम्मेदारी बढ़ी। डॉ. सुनील देवधर और डॉ. राजेन्द्र श्रीवास्तव ने बहुत परिश्रम किया।
सुमीता -  वरिष्ठ साहित्यकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास 'काशी का अस्सी' पर पर डॉ. चन्द्रप्रकाश द्विवेदी जी फिल्म बना रहे हैं। हिन्दी के लेखक भी बहुत अच्छी-अच्छी कहानियाँ लिख रहे हैं। हिन्दी लेखकों की कहानियों में पिक्चर क्यों नहीं बनती? यदि बनी भी हैं तो कौन सी कृपया बताएँ?
डॉ. दामोदर खड़से -  हिन्दी कथाकारों की कृतियों पर कई फिल्में बनी हैं। प्रेमचंद, अमृतलाल नागर, राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी, धर्मवीर भारती, कमलेश्वर जैसे कई हिन्दी लेखकों की कथा पर फिल्में बनी हैं। मेरी भी एक कहानी 'इस जंगल में' टेलीफिल्म बनी है। ऐसी बहुत सी फिल्में बनी हैं, पर संभवत: व्यवसायिक फिल्में कम बनी हैं।
सुमीता -  केवल महाराष्ट्र ही नहीं अपितु देश भर के युवाओं को आप क्या राय देना चाहेंगे कि वे किन तैय्यारियों के साथ लेखन क्षेत्र में उतरे?
डॉ. दामोदर खड़से -  समयगत सच्चाइयों को शिल्पगत कृतियों में ढालने से रचना जीवंत हो उठती है।
सुमीता -  डॉ. साहब क्या साहित्य समाज में परिवर्तन ला सकता है? इसकी उम्मीद की जा सकती है या फिर आपको लगता है कि साहित्य के भविष्य पर संकट मंडरा रहा है?
डॉ. दामोदर खड़से -  साहित्य समाज का प्रतिबिंब है। समाज, साहित्य में स्वयं को देखकर स्वयं में परिवर्तन कर सकता है। यह गणितीय परिणाम भले न दे, परंतु आशा तो की ही जानी चाहिए।
सुमीता -  क्या आप हिन्दी साहित्य की वर्तमान स्थिति से संतुष्ट हैं?
डॉ. दामोदर खड़से -  बहुत कुछ नया लिखा जा रहा है। हिन्दी का कैनवास बहुत बड़ा है, इसकी संभावनाएँ विशाल हैं।
सुमीता -  डॉ. साहब नई पीढ़ी के रचनाकारों के लिए क्या कुछ कहना चाहेंगे आप?
 डॉ. दामोदर खड़से -  खूब पढ़ें; खूब लिखें।


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