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05.03.2012
 
 रबाब : एक काव्यकृति
सुमन कुमार घई

पुस्तक :    रबाब

लेखक :     जसबीर कालरवि

प्रकाशक :   हरकारा प्रकाशन,

           5 मॉडल टाऊन मार्केट, जालन्धर, पंजाब

पृष्ठ संख्या   :     90

सम्पर्क     :     kalravi@hotmail.com

 

जसबीर कालरवि का नाम यहाँ के हिन्दी साहित्य समाज में नया है। पहली बार हिन्दी के मंच पर हिन्दी राइटर्स गिल्ड पर सुनने का अवसर मिला और उनकी कविताओं ने एक अमिट छाप छोड़ी। कम शब्दों और सीधी-सादी भाषा में अपनी बात कह जाने की क्षमता दिखाई दी उनकी कविताओं में। उनकी पहली कविता की पहली ही कुछ पंक्तियाँ थीं –

आजकल वो

पैरों से लिखता है

राहों के कागज़ पर

एक अंतहीन कविता को

अन्तिम रूप देने की इच्छा में।

 

जब उनके काव्य-संग्रह रबाब को पढ़ने का अवसर मिला तो लगा कि यह पाँच पंक्तियाँ शायद उनके लेखन को परिभाषित करती हैं। राह के कागज़ पर चलते हुए उनके कदम उन्हें जीवन के अनेक पड़ावों तक ले जाते हैं और उन्हीं पड़ावों की बात मैं करना चाहता हूँ। उनके लेखन के पीछे जो दर्शन और चिंतन छिपा है उनको इन सीधे शब्दों में समेटते हुए उनकी कविता उन्हें प्रस्तुत करती हैं। इस पुस्तक का एक पक्ष जसबीर कालरवि को जीवन के यथार्थवादी कवि के रूप में प्रस्तुत करता है। वह कहते हैं –

कब शुरू होती सच्चाई, झूठ की हद है कहाँ

बस इसी उलझन में उलझी सी रही मेरी ग़ज़ल।

 

न कोई मतला यहाँ है न कोई मक़ता यहाँ

एक अनजाना तख़ल्लुस ही रही मेरी ग़ज़ल।

 

एक अनजाना तख़ल्लुस कहते हुए जसबीर अपनी पहचान को ढूँढते हुए दिखाई देते हैं। और यह खोज बार-बार उन्हें उनकी मानसिकता की गहराइयों में ले जाती है। यह सफ़र उनकी कविताओं में उभरता है –

फ़लसफ़ों की रोशनी में कुछ नज़र आया नहीं

इस घने जंगल में कोई रास्ता पाया नहीं।

 

वो जो मेरे बौनेपन पर उम्र भर हँसता रहा

आदमी वो था मेरे अंदर, मेरा साया नहीं।

 

अपने होने को पंजाबी में कहूँ तो हौंद का विश्लेषण करते हुए उनकी कविता में भाव का रस निरन्तर बहता है – उनकी कविता दार्शिनिक रूखेपन, मायाजाल के भय में नहीं फंसती। छोटी सी दो पंक्तियाँ हैं – ज़िन्दगी एक हबाब जैसी है/फिर भी दरिया के ख़्वाब जैसी है। जीवन को पानी का बुदबुदा कहते हुए भक्तिकाल से आजतक के कवि पाठक को डराते रहे हैं परन्तु जसबीर ने भाव की कोमलता को रखते हुए उसमें भी सुन्दरता ढूँढी है – फिर भी दरिया के ख़्वाब जैसी है!

उनकी कविता आशा के प्रकाश में उज्ज्वलित रहती है -

 

मैं इक कतरे अन्दर भी समन्दर देख लेता हूँ

हिसारे-ज़ात को गारों के अन्दर देख लेता हूँ।

 

कहाँ भटकन ले जाएगी मेरी मुझको नहीं मालूम

कभी शब्दों, कभी अर्थों के अन्दर देख लेता हूँ।

 

जीवन से समझौता और कैसी भी घड़ी हो... समय हो; उस पल को आशा के साथ जीना ही उनकी कविता है – मुझको उम्मीद  है नस्ले-नौ की कसम / इस ज़मीं को बना देगा जन्नत कोई।

इस काव्य संकलन में जसबीर कालरवि स्वयं अपनी लेखन प्रक्रिया या अपनी ही कविता का विश्लेषण करते हुए भी दिखाई दिए हैं। कविता के जन्म में वह स्वीकार करते हैं कि कवि तो जन्म से ही कवि होता है और जीवन के हर पड़ाव में वह कवि ही रहता है – कविता तो जन्म से ही बोई जाती है / माँ के दूध पर हाथ रख कर... आगे कहते हैं – कविता तो बचपने से ही सरकती है .. , कविता तो जवानी में ही चल पड़ती है/ बिन परछाईं सड़कों पर और इस कविता के अंत तक आते-आते कहते हैं – कविता तो बस ऐसे ही/ख़त्म हो जाती है।

कलम का रहस्य में लेखन प्रक्रिया की बात करते हुए जसबीर कहते हैं – कलम का रहस्य/वो जानते हैं/जो अपने साए से/मुख़ातिब होते हैं। अपने साए से मुख़ातिब होना ही जसबीर की कविता की शक्ति है इस संकलन में। अपने अंदर ही जीवन की शक्ति को ढूँढने का सफ़र जो इस कवि ने राहों के कागज़ पर अंतहीन कविता का किया है वही तो जीवन है।

अब जसबीर की कविता मं अध्यात्म पक्ष को देखते हैं -

अब जब मैं

अहम्‌ की दीवारें देखकर

उनसे अपना कद नापने लगा हूँ

मिलन-बिन्दू आस-पास बहुत दिखते हैं

पर अब मंज़िल बिन्दू में सिमट गई है...।

 

एकल माटी में उन्होंने अपने दर्शन की परिभाषाओं को प्रस्तुत किया है। दरवाज़े कविता में उनके चिंतन की गहराई देखिए –

बूँद ऊपर सागर का गिरना

वर भी है श्राप भी

बूँद के दरवाज़े बन्द हों

तो श्राप

नहीं तो वर घटता है

बूँद सागर हो जाती है

और महासागर की और

चल पड़ती है....।

मौत नींद और सपने में एक बार फिर कवि अपने अन्तर में अनुभव करता है –

बहुत बार महसूस किया

उस मनुष्य को

जो मेरे ही कहीं अंदर है

जिसके लिए –

हर नींद एक अधूरी मौत है

हर मौत एक पूरी नींद।

धर्म कविता में लोभ, मोह, क्रोध और अंहकार को स्वीकार किया है क्योंकि उनकी आशावादी मानसिकता हर मनफ़ी में जमा (उन्हीं के शब्दों में) हर बुराई में भी अच्छाई ढूँढ रही है। इसी तरह उन्होंने धर्म शीर्षक में तीन कविताएँ लिखी हैं और उनमें भी वह धर्म को बाहर नहीं अपने अन्दर ही पाते हैं। शायद उनकी कविता भीतर का सूर्य उनके चिंतन और दर्शन को रेखांकित करती है –

जब भीतर का सूर्य उदय होता है

चेतना समय सीमा से

पार चली जाती है

मन के हर दरवाज़े से

नकली  बोध

बाहर भागता है

शरीर उस वक़्त

पहली बार जागना सीखता है।

अध्यात्म पक्ष के अंत में कहना चाहूँगा कि सपने कविता पढ़ने के बाद उनके दर्शन के अध्ययन की गहराई का अनुमान हुआ और उनकी अध्यात्मिक कविताओं की नींव पता चली।

पुस्तक का तकनीक विश्लेषण नहीं करना चाहता क्योंकि वह तो डॉ. शैलजा सक्सेना ही कर सकती हैं। मैं बस एक पाठक की दृष्टि से देख पाया हूँ इस पुस्तक को। अंत में जसबीर जी को इस पुस्तक के लोकार्पण की बधाई देते हुए उन्हीं का एक शेर पढ़ना चाहता हूँ जो उनकी विनम्रता को प्रकट करता है –

मेरा मज़मून ऐसे है उलझा हुआ

बेदख़ल जैसे हो इक वसीयत कोई

 

मैं बज़ुर्गों की सोहबत में बैठा नहीं

अब कहाँ देगा मुझको नसहीत कोई।


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