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05.03.2012
 
पिघलती शिला
(लेखिका - वीणा विज ’उदित’)

पुस्तक परिचय :    सुमन कुमार घई

पिघलती शिला

लेखिका   :     वीणा विज ’उदित’

प्रकाशक   :     डायमंड पबलिकेशंस

               नई दिल्ली

               sales@diamondpublictions.com

सम्पर्क    :     www.veenavij.com

 

 

सदियाँ बदल गयीं लेकिन भारतीय नारी को अब भी न जाने कितने प्रभावों और दबावों के बीच जीना पड़ता है। सच पूछा जाए तो उसकी भावुकता ही उसकी दुश्मन है। मुझे तो कई बार लगता है कि ज़रा सी बात पर आँसुओं की धार बहा देना भारतीय नारी की कमज़ोरी है। मेंने विदेशों में सार पुरुष समाज के साथ मिलकर और कंधे से कंधा जोड़कर नारी को बराबरी से आगे बढ़ते देखा है हमारे देश में आज भु उसे इन सारी परिस्थितियों से संघर्ष करना पड़ता है। जहाँ वह अपने को नितांत अकेला महसूस करती है। यही स्पष्ट भाव उसे झुकने के लिए मजबूर करता है और वह अपने को प्रथम श्रेणी का नागरिक नहीं बना पाती। इस सत्य के बावजूद ऐसी कई महिलायें हैं जिन्होंने व्यक्ति, समाज और रुढ़िवादी परम्पराओं से संघर्ष किया है और अपनी अस्मिता को बनाये रखा है। वीना की सभी कहानियों में मैंने ऐसी ही मजबूत औरत को देखा है।

     डॉ. राजेन्द्र अवस्थी

पूर्व संपादक, ’कादम्बिनी’

महासचिव, ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया

 

वीणा विज ’उदित’ की कहानियाँ साहित्य कुंज में बहुत पहले से निरन्तर प्रकाशित होती आ रही हैं। इस कहानी संकलन में कई कहानियाँ ऐसी हैं जो कि पाठकों को साहित्य कुंज में मिल जाएँगी। वीणा जी कहानियाँ अधिकतर समृद्ध मध्यवर्गीय भारतीय परिवारों की कहानियाँ हैं। कहानी का मुख्य पात्र अधिकतर नारी ही है। लगता ही की वीणा विज की लेखनी ही उनकी सामाजिक जागरूकता और नारी की पीड़ा, नारी शक्ति और नारी की मानसिकता को व्यक्त करने का माध्यम है।  जैसा कि डॉ. राजेन्द्र अवस्थी ने भूमिका में कहा है कि वीणा विज की नायिका मजबूर नहीं है।

पिघलती शिला’ की कहानियाँ घरेलू कहानियाँ हैं जो कि दिन-प्रतिदिन की समस्याओं से जूझती हुई चलती हैं। अधिकतर कहानियाँ केवल एक घटना पर आधारित न होकर एक लम्बे अर्से तक परिवार के साथ ही चलती हैं। वीणा विज ’उदित’ ने पारिवारिक समस्याओं के पूर्ण पटल को रेखांकित किया है। किशोरावस्था में बच्चों के गलत निर्णय के परिणाम, शराब से नष्ट होते हुए परिवार, बेटों की शादियाँ हो जाने के बाद माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार, औरत पर बाँझ होने का लाँछन इत्यादि अधिकतर कहानियों के विषय हैं। इन सब कहानियों एक भाव बार-बार उभर कर आता है कि भारतीय नारी अगर कमर-कस ले तो कठिन निर्णय लेने से नहीं डरती। वीणा विज की नायिका भी ऐसी ही है। अलग अलग नाम, अलग अलग उम्र, अलग अलग घटनाओं में उलझी नायिका कहानी के अन्त तक एक समर्थ नारी के रूप में उभरती है। किशोरियों के प्रेम के कोमल भावों को बहुत सहजता और कुशलता के साथ कई कहानियों में व्यक्त किया गया है।

जो पाठक वीणा विज ’उदित’ की कविता से परिचित हैं; वह पाएँगे कि लेखिका के काव्य और कहानी की भाषा में बहुत अन्तर है। कहानियों की भाषा अनऔपचारिक, रोज़-मर्रा की भाषा है। कथानक तेज़ी से आगे बढ़ता जाता है; आवश्यकता से अधिक भावाभियक्ति में नहीं फँसता।

उन्नीस कहानियों के इस संकलन में लगता है कि लेखिका की व्यक्तिगत पृष्ठभूमि विभन्न नायिकाओं में दिखती है। क्योंकि वीणा विज ’उदित’ भारत और अमेरिका दोनों देशों में नियमित रूप से समय व्यतीत करती हैं, इसलिए वह दोनों देशों के परिवारों की समस्याओं को समझती हैं और सफलता से अपने साहित्य में व्यक्त करती हैं। उनकी कहानियों में रह-रहकर वृद्धावस्था में माता-पिता की सन्तान पर निर्भरता और सन्तान के द्वारा उपेक्षा आती है परन्तु कहानियों के अन्त तक माता-पिता अपने बलबूते पर आगे बढ़ जाते हैं। वह कमज़ोर नहीं हैं और अधिकतर निर्णय माँ ही लेती है।



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