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ISSN 2292-9754

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06.14.2016


मेरे मन में लिखा पढ़ो तुम भी...

समीक्ष्य पुस्तक: ख़ुमारी
लेखक: जसबीर कालरवी "ख़ामोश"
प्रकाशक: हिन्दी राइटर्स गिल्ड
3577 Nablus Dr.
Mississauga, ON. Canada L5B 3J9
Email: hindiwg@gmail.com
पृष्ठ: 110
मूल्य: $15CDN

मेरे मन में लिखा पढ़ो तुम भी।
रिश्ते ऐसे कभी निभाओ तो॥

"ख़ुमारी" में जसबीर कालरवी का आग्रह है... परन्तु दुविधा है कि किसी लेखक की रचनाओं की समीक्षा करते हुए उन्हें किसी प्रतिष्ठित लेखक की रचनाओं के समक्ष रख कर विचार करें तो लेखक के कथन "मेरे मन में लिखा पढ़ो तुम भी" की क्या उपेक्षा नहीं होगी? मेरा मानना है प्रत्येक रचना अपने आप में अनूठी होती है और प्रत्येक लेखक अपने-आप में एक अलग हस्ताक्षर। उसके लेखन की गुणवत्ता का मापदण्ड पाठक की समझ निर्धारित करती है। समालोचक केवल तकनीक पक्ष के बारे में अपने विचार प्रस्तुत कर सकता है क्योंकि यह परिभाषित पक्ष है और समीक्षक के व्यक्तिगत दृष्टिकोण से स्वतन्त्र है। माना जाता है कि समीक्षक प्रबुद्ध पाठक है – इसलिए वह लेखक की रचनाओं का सही मूल्यांकन करने में  समर्थ है। क्या उसकी समझ के अनुसार रचना पर लगा ठप्पा ही रचना के अच्छे या बुरे होने का अंतिम निर्णय है? मेरे विचारों के अनुसार समीक्षक तकनीक पक्ष की समीक्षा करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन कर सकता है – परन्तु रचना की आत्मा तक पहुँचने का पथ प्रत्येक पाठक के लिए अपना होता है। कुछ पहुँच पाते हैं और कुछ नहीं। हाँ यह कहना भी उचित है कि समीक्षक इस पथ का मार्गदर्शन अवश्य कर सकता है क्योंकि वह प्रबुद्ध पाठक है।

रचना की आत्मा की पहचान है पाठक के मुँह से स्वतः निकलने वाली वाह और आह है; इससे अधिक कुछ भी नहीं। पाठक के लिए इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि साहित्यिक विद्वान/विदुषियाँ रचना-व्याख्या के लिए कितनी परिमार्जित भाषा का प्रयोग करते हैं। जसबीर कालरवी एक समर्थ लेखक हैं जिनकी रचनाएँ पाठक के हृदय को छूती हैं, कभी गुदगुदाती हैं, कभी उसमें टीस जगाती हैं और कभी आक्रोश पैदा करती हैं। जसबीर के हाथ में पाठक एक कठपुतली की तरह रहता है और जसबीर दिल की डोरों को अपने लेखन से नियन्त्रित करते रहते हैं।

जसबीर कालरवी कविता, ग़ज़ल व नावल तीनों ही विधाओं में लिखते हैं और तीनों ही भाषाओं पंजाबी, हिन्दी और उर्दू में उनकी पुस्तकें उपलब्ध हैं। उनकी पंजाबी में सात पुस्तकें, हिन्दी में चार पुस्तकें और उर्दू में एक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी हैं।

जसबीर कालरवी के लेखन में विधा के अनुसार सभी गुण उपस्थित रहते हैं। भाषा और शब्दावलि का चयन भी रचना को समृद्ध बनाता है। "ख़ुमारी" की ग़ज़लों के माध्यम से उसने भारत की दो बड़ी भाषाओं, उर्दू और हिन्दी को नज़दीक लाने की कोशिश की है, इसलिए यह ग़ज़लें उस भाषा में कही गई हैं जो सारा भारत बोलता है। किसी शे’अर में आवश्यकता होने पर हिन्दी के शब्दों के उपयोग से परहेज़ नहीं किया गया और ऐसा करने से भाषा समृद्ध हुई है और ग़ज़ल पाठक के अधिक करीब हो गयी है। जैसा कि नीचे की पंक्तियों में स्पष्ट होता है –

मुझे तो उम्र अपनी लग रही बीते समय जितनी।
मगर किस दिन जीया मैंने कैलेण्डर देख लेता हूँ॥

कभी हमने नहीं देखा कभी उसने ना पहचाना।
कभी अपने कभी उसके आडम्बर देख लेता हूँ॥

कहाँ ‘ख़ामोश’ सी भटकन मुझे अब लेके जायेगी।
कभी शब्दों कभी अर्थों के अन्दर देख लेता हूँ॥

यह एक ही ग़ज़ल के तीन शे’अर हैं। पहले में "समय", "कैलेण्डर"; दूसरे में "आडम्बर" और तीसरे में "शब्दों" और "अर्थों" का प्रयोग स्वाभाविक प्रतीत होता है और शब्द थोपे गये नहीं लगते।
जसबीर ने अपनी ग़ज़लों में जीवन के प्रत्येक पक्ष को छूआ है, उसे जिया है और उसपर अपनी टिप्पणी की है।

अभी कुछ साल पहले तो वहाँ सारे ही रिश्ते थे।
मगर अब गाँव में मेरे किसी का कौन रहता है॥

क्योंकि जसबीर कालरवी कैनेडा में रहते हैं, इसे हम प्रवासी मन की पीड़ा कह सकते हैं परन्तु यह गाँव छोड़कर महानगर में बस जाने पीड़ा नहीं है क्या? अपने पैतृक घर से दूर होने की पीड़ा एक सी है। फिर शायर परिस्थितियों को स्वीकार करता है –

ये दिल का परिन्दा यहाँ रोज़ तड़पे।
इसे सबसे पहले कोई और घर दो॥

इसी भाव के दूसर पक्ष में जसबीर कालरवी घर को सजीव मानते हुए लिखते हैं:

आज ‘जसबीर’ आयेगा लगता।
रोज़ ही सोचता मेरा घर है॥

एक अन्य ग़ज़ल में:

सब दीवारों से बाहें निकली थीं।
जब भी मुद्दत के बाद घर देखा॥\"

ख़ुमारी" की ग़ज़लें संपूर्ण जीवन की ग़ज़ले हैं। राजनैतिक मुद्दे, धार्मिक विडम्बनाएँ, व्यक्तित्व के प्रश्न, प्रेम, बिछोह, मिलन यानी कि मानव जीने के लिए जिन गलियों में से गुज़रता है, जसबीर की ग़ज़लें भी उन्हीं गलियों से गुज़रती हैं। जसबीर देश की आज़ादी के बाद से अब तक की परिस्थिति पर टिप्पणी करते हैं:

अँधेरों की हकूमत है कफ़स में रोशनी होगी।
कि अपना मुल्क भी आज़ाद है ये कौन कहता है॥

समाज की आर्थिक विसंगतियाँ और उन्हें झेलने वालों के लिए शायर का दिल रोता है:

सुना है सर्द मौसम में कभी वो सो नहीं पाता।
वो पागल आस्मां को ओढ़कर फिर खींचता होगा॥

इसके बाद परायी पीड़ा के लिए बहे आँसू की बहुमूल्यता को समझते हुए कह उठते हैं:

मेरी आँखों के अंदर खो गया निकला हुआ आँसू।
मुझे मालूम है वो जब मिला मोती बना होगा॥

जसबीर कालरवी के संपूर्ण साहित्य पर चाहे कविता हो, उपन्यास हो या ग़ज़ल , एक दार्शनिक बोध की छाया होती है, जो कि उनके व्यक्तित्व से उपजती है। परन्तु क्या कभी कोई भी दार्शनिक विचारधारा जीवन को परिभाषित कर पाई है? इसी की कुंठा कुछ इस तरह व्यक्त की है जसबीर ने:

फ़लसफ़ों की रोशनी में कुछ नज़र आया नहीं॥
इस घने जंगल से कोई रास्ता पाया नहीं॥

फिर स्वीकार करते हैं:

मैं ना सुकरात हूँ ना सरमद हूँ।
मैं तो अपने ही राज़ की चुप हूँ॥

और कभी जीवन की क्षणभंगुरता के लिए कहते हैं:

ज़र्द पत्ता हूँ बढ़ाऊँ काँपता सा हाथ मैं।
पर मेरी पागल हवा से दोस्ती होती नहीं॥

परमात्मा से जसबीर कालरवी का रिश्ता भी अलग सा है वह परमात्मा की आँखों में झाँक कर कहते हैं:

जब तेरी आँखों में झाँकूँ भीड़ सी आये नज़र।
हमसे इतने शोर में तो बन्दगी होती नहीं॥

प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए प्रशंसा करते हैं:

बिना माँगे तुम्हें सब कुछ यहाँ कुदरत से मिलता है।
इसे अपनी दुआ समझो या फिर उसकी अदा कहना॥

इतना कुछ कह लेने के बाद भी शायर जसबीर कालरवी "ख़ामोश" ख़ुद को परिभाषित कर देते हैं:

शब्द होते तो अर्थ मिल जाते।
मैं तो उम्र-ए-दराज़ की चुप हूँ॥

शायर के हाथ दुआ में उठ जाते हैं:

ख़्यालों की कश्ती को बहने का वर दो॥
मगर उसको पहले तूफ़ानों से भर दो॥
....
मैं ‘ख़ामोश’ आख़िर कहाँ तक रहूँगा।
तू इस खेल से मुझको आज़ाद कर दो॥

"ख़ुमारी" का हरेक शे’अर उम्दा है। हर भाव में कसक है, हर प्रश्न सोचने पर मजबूर करता है, पढ़ते हुए पाठक को लगता है कि उसका सीधा संवाद लेखक से हो रहा है। पृष्ठों का बंधन है – और साहित्य की गहरायी अथाह। । उन्होंने अपनी ग़ज़लों में छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बहर का सफलतापूर्वक प्रयोग किया है। यह ग़ज़लें हिन्दी साहित्य को एक नई दिशा की ओर अग्रसर करती हैं।
आशा है कि आप इस शायर को उत्साह से पढ़ेंगे क्योंकि:

हो गर दिल की धड़कन बयां उँगलियों से।
तभी काग़ज़ों पर उतरती ख़ुमारी॥


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