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05.03.2012
 
 किराये का नरक - एक यात्रा
लेखक : तेजेन्द्र शर्मा
सुमन कुमार घई

 

तेजेन्द्र शर्मा की कहानी किराये का नरक कुछ अंक पहले साहित्य कुंज में प्रकाशित हुई थी। कहानी का आरम्भ पढ़ने के बाद आभास हुआ कि कथानक सामान्य है अमीर बाप कि बेटी और गरीब परिवार के पुरुष में प्रेम, विवाह और अन्त में उकताई हुई ज़िन्दगी। क्योंकि मैं तेजेन्द्र जी की बहुत सी कहानियाँ पढ़ चुका हूँ इसलिए उनकी लेखन प्रतिभा से भी परिचित हूँ। तेजेन्द्र सामान्य कहानीकार नहीं है तो फिर यह कहानी का स्तर साधारण सा रह जाए; असम्भव!

कहानी का नायक एक सफ़र कर रहा है। गाड़ी के स्टेशन आ रहे हैं और वह आगे बढ़ रहा है। गाड़ी का एक दिशा में आगे बढ़ना और स्टेशनों का आना  नायक के जीवन की सामानन्तर यात्रा है। जीवन-यात्रा! अपनी उकताई हुई और दैनिक अपमानित दाम्पत्य जीवन से सुलगी हुई आग प्रतिशोध की ज्वाला बन जाती है। इस कहानी की असाधारणता प्रतिशोध है। नायक अपने जीवन के साथ-साथ अपनी पत्नी का जीवन समाप्त करना चाहता है और उसके लिये उसका हथियार भी असाधारण है एड्‌स जैसा संक्रामक रोग। इस प्रतिशोध को काल्पनिक नहीं कहा जा सकता क्योंकि पश्चिमी जगत में ऐसी कई दुर्घटनाएँ/अपराध/कुंठित-प्रतिशोध घट चुके हैं। पश्चिमी समाज ने तो  जान-बूझकर अपने साथी को एड्स ग्रस्त करना अब अपराध घोषित कर दिया है और कई लोग अब जेल भी काट रहे हैं।

तेजेन्द्र शर्मा की कहानियाँ सदा से ही आज के दिन में जीती हैं। चाहे काला-सागर हो या रेत का घरौंदा या कोई अन्य कहानी, मेरे कहने का भाव है कि आज की समस्या या आज की मानिसता या आज के समाज की अवस्था या व्यवस्था ही कहानी में रेखांकित होती है। या यूँ भी कहा जा सकता है कि तेजेन्द्र की कहानी उसके जीवन के साथ-साथ यात्रा कर रही है कहानी के नायक की तरह। 

खार जिमखाना पहुँच गया हूँ। इस जगह की यादें भी तो मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी हैं। हमारे विवाह के बाद की कितनी ही शामें यहाँ बीती थीं।...तृप्ति भी तो लगभग हर क्लब की सदस्य है...जूहू, खार, बान्दरा।...

बान्दरा स्टेशन के बाहर ही दो कोढ़ी भीख माँग रहे हैं।...कहीं मुझे उनमें अपना भविष्य तो नहीं दिखाई दे रहा है।..

यहाँ से बम्बई सेण्ट्रल तक पैदल चलना शुरू कर दूँ। और अगर रास्ते में ही कहीं गिरकर दम टूट जाये...तो...मेरे लिए अच्छा ही रहेगा।..

नायक हर स्टेशन से अपने जीवन का कोई विशेष भूत या भविष्य का पल जोड़ता है। लगता है यह ट्रेन की यात्रा उसके जीवन की यात्रा है। और अन्त में – “अब उस घर में मेरा क्या काम था? मुझे अपनी अच्छी गब्दु और बुरी तृप्ति से बहुत दूर चला जाना था।...और मैं जा रहा हूँ।...गाड़ी वापिस दादर, बान्दरा, विले पार्ले, अंधेरी और बोरीवली को पीछे छोड़कर मुझे एक अनजान गंतव्य की ओर ले जा रही है।

अपनी मौत को प्रत्यक्ष देखते हुए उसका अपना बीता जीवन उसके सामने चलचित्र की तरह पर्दे पर अंकित होता है। इस फ़्लैशबैक से पाठक भी नायक के साथ यात्रा करनी शुरू करता है। वैवाहिक जीवन में घुलते विष को पाठक भी उतना ही जीता है जितना की नायक। अपने पुत्र और उसकी संतति को तरसते माता-पिता की पीड़ा, नायिका के पिता को अपनी पुत्री की मानसिकता की समझ और इस से उत्पन्न होती सहानुभूति और फिर नायक का निर्णय। पाठक एक सूत्र पर चलता हुआ लेखक के साथ-साथ चलता है। यही इस कहानी की सफलता है। कहानी यात्रा से शुरू होती है और यात्रा पर ही अन्त ।

कहानी के बारे में बहुत कुछ नहीं लिखना चाहता क्योंकि इच्छा है कि आप स्वयं इस कहानी को पढ़ें और आप भी नायक के साथ यात्रा करें जो कि मैंने की है।



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