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05.03.2012
 
 "फ़ैसला सुरक्षित है" - एक परिचय
सुमन कुमार घई

पुस्तक :  फ़ैसला सुरक्षित है

लेखिका : डॉ. प्रतिभा सक्सेना

प्रकाशक : रचना पब्लिकेशंन्स, दिल्ली

सम्पर्क : 

 

 

"फ़ैसला सुरक्षित है" डॉ. प्रतिभा सक्सेना का हास्य-व्यंग्य के पद्य और गद्य का संकलन है। ख़ुश रहना मानव की आवश्यकता है, तभी तो विषम से विषम परिस्थितिओं में भी मानव कोई न कोई विनोद का ढंग खोज ही निकालता है। इसके बिना मनुष्य का जीवन संभव ही नहीं है। हास्य-व्यंग्य की विधा उतनी ही पुरातन है जितना कि साहित्य – चाहे वह किसी भी भाषा का हो। लेखिका  डॉ. प्रतिभा सक्सेना स्वयं पुरोवाक्‌ में लिखती हैं – हास्य-विनोद मान की सहज वृत्ति है। पशु हँसते-मुस्कराते नहीं, लेकिन विनोद वृत्ति उनमें भी पायी उनमें भी होती है

यह वृत्ति किसी में अधिक और किसी में कम चाहे हो पर होती अवश्य है। इस भाव को पन्नों पर उतारने की प्रतिभा हर लेखक में नहीं होती। यह कला भी अन्य कलाओं की भाँति दैविक ही है। अक्सर पाया जाता है कि जो लेखक विविशता पूर्वक या किसी अन्य कारण से हास्य-व्यंग्य की विधा में लिखने का प्रयास करते हैं वह सफल नहीं हो पाते – जब तक कि यह गुण उनकी प्रकृति का भाग न हो। प्रतिभा जी के लेखन से साहित्य कुंज के पाठक अभिज्ञ नहीं हैं। उनके हास्य-व्यंग्य की अनेक रचनाएँ साहित्य कुंज में प्रकाशित हो चुकी हैं। परन्तु यह प्रथम अवसर है जब मुझे उनकी पुस्तक फ़ैसला सुरक्षित है को पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ।

इस संकलन में १६ गद्य और ८ पद्य रचानाएँ संकलित हैं। प्रतिभा जी के लेखन में एक बात जो स्पष्ट दीखती है कि उनके व्यंग्य में तीखापन मन को आहत नहीं करता पर कुछ सोचने को विवश अवश्य करता है। हास्य रचनाएँ पाठक को खुल कर हँसने पर मजबूर कर देती हैं।

संकलन की पहली रचना हड़ताल और हम एक सामाजिक टिप्पणी है। हड़तालें, घेराव और राजनैतिक प्रर्दशन इत्यादि भारत की दिनचर्या का भाग बन चुके हैं। हड़ताल हो जाने से जीवन रुकता नहीं है बल्कि हड़ताल-भोगियों को नए रास्ते खोजने के लिए विवश करता है कि जीवन की गति रुके नहीं। यह रचना भी ऐसा ही कुछ प्रस्तुत करती है। नायिका की अन्तिम पंक्ति – छोड़िये भी। लौटना तो अपने घर है – देर सवेर पहुँचे तो भी चलेगा स्पष्ट करती है कि ऐसे समय में समझौते सहज हो जाते हैं।

दूसरी रचना कहूँगा नहीं हास्य की है। अब प्रतिभा जी हिन्दी पढ़ाती रही हैं। व्याकरण और दैनिक भाषा की सूक्ष्मताओं को माइक्रोस्कोप के नीचे रखा है प्रतिभा जी ने इस रचना में। कहना चाहता हूँ किसी भी अवस्था में कहता हूँ नहीं हो सकता; इस रचना का आधार है।

जब हमने झाड़ू खरीदी सफ़ेदपोशी पर प्रहार है – व्यंग्य और हास्य से मिश्रित। दैनिक काम जैसा कि झाड़ू खरीदना भी कितना जोखिम भरा हो सकता है इस रचना को लगभग एक जासूसी नॉवेल का रूप देकर प्रस्तुत किया है। नायक और नायिका इस उलझन में हैं कि झाड़ू खरीद कर किस तरह से घर वापिस पहुँचें। रास्ते में अगर किसी ने देख लिया तो बात बन जाएगी। झाड़ू खरीदने के बाद वापिसी का वृत्तांत रोमांचित करता है!

अब क्या बोलूँ सामाजिक व्यंग्य है। एक पीढ़ी पहले का अपने से बड़ों का नाम न लेने के बंधन को अपने कल शब्दों से बींधा है लेखिका ने। शुरू से अंत तक यह रचना पाठक को गुदगुदाती रहती है। इसी रचना का दूसरा पक्ष है सास का दोहरा मानदंड जिससे वह अपनी बेटी और बहू अलग अलग स्वतंत्रता देती है। ननद का भाभी को यह कहना – कहीं न काट के फेंक देगी। अपनी बिटिया की तो सब बातें दबा दी जाती हैं, वो सब तो तुम्हें सुनाने के लिये हैं इस दोहरे रिश्ते को बयान करती है।

इनसे मत कहना हास्य है पर उपभोक्तावाद पर नर्म सा व्यंग्य भी। प्राईवेसी कहाँ कवियों पर एक गहरा कटाक्ष है नख-शिख वर्णन के सन्दर्भ में। डॉ. प्रतिभा सक्सेना ने कवियों की अच्छी खींचाई कि है चाहे वह कालिदास हैं, विद्यापति हों या बिहारी। इस निबन्धरूपी व्यंग्य को पढ़ने के बाद कवियों को काला चश्मा लगाना पड़ सकता है क्योंकि उनकी हर नज़र पर महिलाओं को शक अवश्य पैदा होगा।

फ़ैसला सुरक्षित है भारत की न्याय व्यवस्था पर करारी चोट है तो नरकपालिक, सुअर-पालक और हड्डी के डाक्टर प्रशासनिक अव्यव्स्था पर प्रहार करती है। और अम्मा जी भारत की चुनाव प्रक्रिया और विजेता के काया-कल्प को पन्नों पर उतार रही है भगवान जाने कुछ धार्मिक प्रश्न  पूछती है। कोफ़ी अन्नान की बीवी में हास्य तो है ही पर साथ ही साथ इंटरव्यू-पेनल की प्रतिभा पर भी प्रश्न चिन्ह लगाती है। पति-भ्रम विशुद्ध हास्य है। गोरी का साँवरा शादी के बाद रोमांस के हश्र पर व्यंग्य है। मैं गोपी भी नहीं नवयोवना के हृदय में प्रस्फुटित होती शृंगार-रस के भावों का वर्णन है।

वास्तव में अन्तिम रचना बेल का शर्बत बनाने की विधि – मर्दानी पढ़ कर हँसते हुए पेट पकड़ने को विवश होना पड़ता है। हो सकता है कि कुछ मर्दों को यह रचना कुछ व्यक्तिगत आक्षेप करती लगे; पर स्व:सर्वेक्षण करने का इससे अच्छा अवसर नहीं मिलेगा।

अन्त की आठ कविताओं सहित प्रतिभा जी का यह संकलन विशेषकर नवोदित हास्य-व्यंग्य के लेखकों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसे पढ़ने वह सीख पाएँगे कि किस तरह से भोंडे हास्य से बचा जा सकता है और व्यंग्य कैसे मन को गुदगुदा कर सोचने को विवश करता है बिना आहत किए। यह कहना कि व्यंग्य को तीखा प्रहार करना चाहिए – एक अतिशयोक्ति है; यह पुस्तक इस कथन का प्रमाण है। भाषा सीधी और सधी है। प्रतिभा जी की कविताओं के पाठक उनकी भाषा की प्रतिभा से परिचित हैं। परन्तु लेखिका ने अपने हास्य-व्यंग्य और अन्य रचनाओं की भाषा को बिल्कुल अलग रखा है। इसी कारण यह संकलन एक साधारण पाठक के लिए भी उपयुक्त है बल्कि यह भाषा ही लेखन की प्रतिभा है।



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