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05.03.2012
 
चश्मे अपने-अपने – एक नज़र
सुमन कुमार घई

लेखिका:                                                    डॉ. हंसा दीप
प्रकाशक:      डायनेमिक पब्लिकेशंस (इण्डिया) लि०
कृष्णा हाऊस, २/११, अंसारी रोड
दरिया गंज, देहली-२, भारत
खरीदने के लिए सम्पर्क करें: 
deephindi@juno.com

 डॉ. हंसा दीप के पहले कहानी संकलन “चश्मे अपने-अपने” का नाम बहुत ही उपयुक्त लगा। वैसे तो लेखक अपने “चश्मे” से जैसा देखता है वैसा ही वह लिखता है और लिख पाता है। संकलन की कहानियों को पढ़ते हुए पाठक अनुभव करता है कि वास्तव में हंसा जी ने अपने आस-पास की दुनिया को समीप से न केवल देखा ही बल्कि बड़ी कुशलता से अपने अनुभवों को इस पुस्तक द्वारा पाठकों के सामने रख दिया है। एक बार किसी के द्वारा कहानी लेखन प्रक्रिया के विषय पर पूछे जाने पर स्यात्‌ ही मुँह से निकला था कि – लेखक के व्यक्तिगत अनुभवों, आसपास की घटित घटनाओं की काल्पनिक सम्भावनाओं से कहानी की उत्पत्ति होती है। चश्मे अपने-अपने” पढ़ते हुए पाठक यह ही अनुभव करता है कि हंसा दीप जो कि एक लम्बे अर्से से भारत से बाहर रह रही हैं, ने अपनी भारतीय जीवन की पृष्ठभूमि की स्मृतियों और अनुभवों को अपनी कहानियों में ढाल दिया है। हंसा दीप मेघनगर (जिला झाबुआ, मध्य प्रदेश) से हैं और इसी कारण जहाँ भी आवश्यक हुआ उन्होंने मालवी और भीली भाषा के प्रयोग में संकोच नहीं किया – यही कारण है कि वह कहानियाँ सजीव हो उठी हैं और वास्तव में ऐसा कर के उन्होंने कहानियों के पात्रों के साथ न्याय किया है। कहानी की भाषा काल, संदर्भ और पात्र के अनुसार ही होनी चाहिए। कहानियों के कथानक कहीं पर भी भाषा से बोझिल नहीं हुए हैं।

डॉ. हंसा दीप के इस कहानी संकलन की कहानियों को कई वर्गों में बाँटा जा सकता है। पहले वर्ग की कहानियों में उन्होंने भारत में आस-पास के जीवन को और रोचक पात्रों को कथानक का आधार बनाया है। “पानू और मामू” कहानी को पढ़ते हुए लगता है कि पाठक भारत के किसी बस अड्डे पर ही खड़ा है और रोज़-मर्रा का जीवन उसकी आँखों के आगे एक चलचित्र की भाँति घटित हो रहा है। प्राय: चाय-पान की दुकान ऐसे स्थानों पर सामाजिक केन्द्र बिन्दु होता है और लेखिका ने सफलतापूर्वक इसे स्थापित किया है और विशेषता यह कि कहानी के अनुपस्थित पात्र “मामू” के लौटने की प्रतीक्षा न केवल पानू को रहती है अपितु पाठक को भी होने लगती है।

“चश्मे अपने-अपने” भी बस-यात्रा पर ही आधारित है। यह तो हम सभी जानते हैं कि बस-कंडक्टर की अपनी एक अलग ही भाषा और जीवन शैली होती है। कंडक्टरों की रोचक भाषा-शैली और उनके क्रिया-कलाप बस-यात्रा की बोरियत से यात्रियों को उबारने सहायक होते हैं। ऐसा ही कुछ इस कहानी में है। यह कहानी न केवल पाठकों का मनोरंजन करती है अपितु भारत में तृण-मूल तक फैले भ्रष्टाचार पर भी एक व्यंग्य है।

दूसरे वर्ग की कहानियों में ग्रामीण जीवना सजीव चित्रण है। “बिल्ली और चूहा”,”काई”, दर्पण, “पगडंडी और सड़क”, “उजाले का षडयंत्र”, “इंटरव्यू” आदि ऐसी ही कहानियाँ हैं। इनमें शोषण, ग्रामीण जीवन की लाचारी से लेकर रिश्तों की मिठास तक सभी भाव भरे हैं लेखिका ने।
अगर हंसा जी ने ग्रामीण जीवन को प्रस्तुत किया है तो तीसरे वर्ग में अपने शहरी जीवन को भी उन्होंने दृष्टि से ओझल नहीं होने दिया है। गृहिणी की दिनचर्या से लेकर नौकरी की राजनीति की पृष्ठभूमी लेकर उन्होंने कई कहानियाँ इस संकलन में संकलित की हैं। पारिवारिक जीवन में “सेतु” बनी माँ, “चील के पंखों की चाहत” में स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों की मानसिकता, “पति-परमेश्वर”, “अपनी-अपनी खामोशी” और “मरुथल की रेत” कहानियाँ गृहिणी की दिन-चर्या को लेकर लिखी गयी हैं। “तुलाराम” में यूनियन की शक्ति के आगे लाचार बाबू के प्रति करुणा का भाव जागता है।

उत्तरी अमेरीका की पृष्ठभूमि में रची कहानी “पिघलती बर्फ़” में संस्कृतियों का टकराव और दो पीढ़ियों का समय के साथ समझौते का चित्रण है। जो कहानी मुझे पूरे संकलन में सशक्त लगी वह है – “पापा की मुक्ति”। कहानी का आरम्भ एक छोटी बच्ची के पापा की मौत से होता है। कहानी उस छोटी बच्ची के दृष्टिकोण से लिखी गई है। माँ पर छाया अपराध-बोध, अन्त में उसका बच्ची पर बरसना, अफ़सोस पर आए मेहमानों की आँखों से बरसती औपचारिक करुणा से परेशान बच्ची की मानसिक अवस्था को बहुत ही सशक्त कहानी के रूप में ढाला गया है। बहुत कम ऐसी कहानियाँ पढ़ने को मिल पाती हैं।

एक और बात डॉ. हंसा दीप के लेखन में उभर कर आती है कि उनकी कहानियों के महिला पात्र लाचार नहीं, अशक्त नहीं। “सौदा” की सुधि का – लड़की देखने की प्रक्रिया (शादी के रिश्ते के लिए) के प्रति विद्रोह का स्वर, “इन्हें जाने दो पापा” में दामाद की होश ठिकाने लगाने में तनु का स्वर, “चलते-चलते” में शरारती छात्रों को साधता रश्मि का स्वर आज की आधुनिक स्त्री के सशक्त होने की घोषणा करता है।

पुस्तक में कहानियाँ बहुत ही सहज गति से चलती हैं। कहानियाँ लम्बी नहीं हैं – यानि आज के व्यस्त जीवन में इन्हें पढ़ने में कोई असुविधा नहीं होती। भाषा कहानियों के अनुरूप है। जगह जगह पर लेखिका की कलम से कई प्रभावशाली पंक्तियाँ अनायास ही झरती हैं। पाठक एक क्षण को ठिठक कर, कहानी भूल – लेखन कला की सुन्दरता को सराहने के लिए विविश हो जाता है।

डॉ. हंसा दीप ने यह पुस्तक लिख कर वास्तव में ही साहित्य प्रेमियों को एक अनुपम उपहार दिया है।


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