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ISSN 2292-9754

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09.17.2017


दो देशों के बीच घूमती हुई कहानियों का सतरंगी संसार
समीक्षक : डॉ. पुष्पा दुबे

सच कुछ और था... (कहानी संग्रह : सुधा ओम ढींगरा)
प्रकाशन : शिवना प्रकाशन,
सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट, बस स्टैंड के सामने,
सीहोर, मप्र,
466001
दूरभाष : 07562405545
वर्ष : 2017
मूल्य : 250 रुपये
पृष्ठ : 120

डॉ. पुष्पा दुबे

सुधा ओम ढींगरा की कहानियाँ इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कहानियाँ होती हैं कि वे कहानियाँ एक साथ दो देशों, दो संस्कृतियों, दो परिवेशों में घटित होती हैं। इन कहानियों में पाठक को एक साथ दो अलग-अलग देशों के बीच आवाजाही का अवसर मिलता है। सुधा ओम ढींगरा की कई कहानियाँ चर्चित रही हैं और पिछले वर्ष प्रकाशित हुआ उनका उपन्यास "नक़्क़ाशीदार केबिनेट" भी पाठकों द्वारा काफी पसंद किया गया। उनके तीन कहानी संग्रह पूर्व में प्रकाशित हो चुके हैं "वसूली", "कौन सी ज़मीन अपनी" तथा "कमरा नंबर 103" इसके अलावा एक प्रतिनिधि कहानियों का संग्रह भी "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" नाम से प्रकाशित हो चुका है। सुधा ओम ढींगरा की कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि पिछले पैंतीस सालों से अमेरिका में निवासरत होने के बाद भी उनकी कहानियाँ भारत के वर्तमान सरोकारों से अच्छी तरह से परिचित होती हैं। उनकी कहानियाँ दूसरे प्रवासी रचनाकारों की तरह तीस-पैंतीस साल पूर्व के भारत में रुकी हुई नहीं होती हैं। ये कहानियाँ वर्तमान भारत में विचरण करती हैं और वर्तमान भारत का ही विवरण देती हैं। प्रवासी साहित्यकारों में अधिकांश का साहित्य इसलिए भारत की मुख्य धारा में प्रवेश नहीं ले पा रहा है कि वे उसी समय के भारत में रुके हुए हैं जिसे वे छोड़ कर गए थे। यह एक तेज़ समय है, इसमें परिवर्तन भी तीव्र गति से हो रहे हैं। ऐसे में रचनाकार को हमेशा सचेत रहना होगा, विशेषकर तब जब आप जिस जगह की कहानी लिख रहे हैं, उसे जगह को बरसों पूर्व छोड़ कर जा चुके हैं। यह सावधानी सुधा ओम ढींगरा की कहानियों में दिखाई देती है, शायद इसीलिए प्रवासी रचनाकारों में संभवतः वे पहली ऐसी रचनाकार हैं जिनको हिन्दी की मुख्य धारा ने और पाठकों ने, दोनों ने स्वीकार किया है। सुधा ओम ढींगरा की कहानियों में भाषा के स्तर पर भी विशेषता यह होती है कि उनकी कहानियों के पात्र तीस-पैंतीस साल पूर्व की हिन्दी नहीं बोलते बल्कि आज की आम बोलचाल की हिन्दी बोलते हैं। प्रवासी रचनाकारों के साथ दूसरी बड़ी समस्या भाषा के स्तर पर ही आती है, उनके पात्र सत्तर-अस्सी के दशक में रुके हुए से लगते हैं। इस कारण संप्रेषणीयता के स्तर पर रचना कमज़ोर हो जाती है। लेकिन सुधा ओम ढींगरा की कहानियाँ इस कमज़ोरी से भी पार पा चुकी हैं। तीसरा बिन्दु शिल्पगत प्रयोग हैं। लेखक जब तक समकाल में क्या लिखा जा रहा है, उसे नहीं पढ़ेगा तब तक वह अपने ही समय में रुका रहेगा। सुधा ओम ढींगरा की कहानियों को पढ़कर लगता है कि वे अपने समकालीनों को ख़ूब पढ़ती हैं और अपने से बाद के लेखकों को भी। किसी भी लेखक के लिए यह जानना बहुत ज़रूरी होता है कि उसके बाद की पीढ़ी किस प्रकार का लेखन कर रही है। जो लेखक यह नहीं करता वह चुक जाता है। सुधा ओम ढींगरा की कहानियों में शिल्पगत प्रयोग जो देखने को मिलते हैं, उनको देखकर लगता है कि लेखिका अपने से बाद की पीढ़ी के रचनाकारों की रचनाओं पर भी नज़र रखे हुए हैं, यह एक अच्छी बात है।

"सच कुछ और था.." कहानी संग्रह सुधा ओम ढींगरा का नया कहानी संग्रह है। ख़ूबसूरत और रहस्यमय आवरण में लिपटी किताब जिसमें ग्यारह कहानियों को संकलित किया गया है। पहली कहानी "अनुगूँज" है, यह कहानी सच और झूठ के बीच निर्णय लेने में फँसी हुई कथा नायिका मनप्रीत के अंतर्द्वंद्व की कहानी है। जब एक तरफ़ परिवार हो और दूसरी तरफ़ सच हो, तो निर्णय लेने में ऊहापोह की स्थिति आना बहुत स्वाभाविक सी बात है। इस कहानी में भी इसी अंतर्द्वंद्व को बहुत सुंदरता के साथ चित्रण किया गया है। उस मानसिक स्थिति को शब्दों के माध्यम से बहुत ख़ूबी के साथ उकेरा है, जिसमें मनप्रीत जी रही है। वास्तव में कहानी की पठनीयता का सबसे सशक्त पक्ष वह अंतर्द्वंद्व ही है, जो पाठक को अपने साथ जोड़ लेता है। कहानी जब समाप्त होती है तो पाठक जैसे राहत की साँस लेता है, क्योंकि वह मनप्रीत से वही चाहता है, जो मनप्रीत अंत में करती है। अच्छी कहानी वही होती है जो पाठक को कथा में प्रविष्ट करवा दे और पाठक स्वयं को पात्र मानने लगे। दूसरी कहानी "उसकी ख़ुशबू" जिस प्रकार की कहानी है, उस प्रकार की कहानियों को लिखना हिन्दी साहित्य में अपराध माना जाता है, यह बात अलग है कि पाठक इस प्रकार की कहानियों को बहुत पसंद करते हैं। रहस्य और रोमांच की कहानियों को हिन्दी में ख़राब कहानियाँ माना जाता है। हालाँकि नई पीढ़ी ने आकर इस स्थापना को भी तोड़ा है। यह कहानी भी एक रहस्य की कहानी है। कहानी अमेरिका में घटित तो होती है, लेकिन है इस प्रकार की कि यदि उसमें स्थान और पात्रों को भारत का कर दिया जाए तो यह कहानी भारत की हो जाएगी। यह इस कहानी की सबसे बड़ी विशेषता है। एक सामान्य से विषय को उठाकर उस पर रोचक कहानी रच दी गई है। कहानी समाप्त होती है तो इत्र की तीखी ख़ुशबू पाठक को भी महसूस होती है। तीसरी कहानी "सच कुछ और था..." जो कि संग्रह की शीर्षक कहानी है, सबसे लम्बी कहानी भी है। लेकिन लम्बी कहानी होने के बाद भी यह कहानी अपनी पठनीयता को बनाए रखती है। यह कहानी दाम्पत्य जीवन के उजले पानी के अंदर जमी तलछट पर रोशनी डालती है। सुधा ढींगरा की कहानियों के पात्र मनोविज्ञान के धरातल पर भी शोध करने योग्य पात्र होते हैं। इस कहानी में भी जो तीनों प्रमुख पात्र हैं वे इसी प्रकार के हैं। कहानी भारत और अमेरिका के बीच की ज़मीन पर दोनों देशों के साझा समय में घटित होती है। एक हत्या को केंद्र में रखकर लेखिका ने कहानी का ताना-बाना बहुत कसावट के साथ बुना है। लम्बी कहानी को यदि कसावट के साथ नहीं बुना जाए तो झोल आने में देर नहीं लगती है। हत्या की पड़ताल करती हुई कहानी धीरे-धीरे दाम्पत्य के अंदरखानों में जमी हुई धूल को उजगर करती है। संग्रह की सबसे लम्बी और सबसे दिलचस्प कहानी है यह।

"पासवर्ड" कहानी सुधा ओम ढींगरा की चर्चित कहानियों में से एक है। यह कहानी भी घटित तो अमेरिका में होती है लेकिन सब कुछ ऐसा है जो किसी भी देश का हो सकता है। पढ़ते समय कहीं नहीं लगता कि यह तो हमारे देश में नहीं हो सकता। हालाँकि जो घटनाक्रम है वो अमेरिकन परिवेश में घटित होता है किन्तु भारतीय पात्र होने के कारण पाठक को खटकता नहीं है। ठगी की एक कहानी को लेखिका ने अपना विषय बनाया है। इस प्रकार की घटनाएँ बहुत आम घटनाएँ हैं और यह दोनों तरफ़ से घटती हैं, मतलब एन आर आई द्वारा धोखाधड़ी और एन आर आई के साथ धोखाधड़ी। यह कहानी दूसरी तरह की कहानी है। तकनीकी दुनिया के सबसे ज़रूरी औज़ार पासवर्ड को केंद्र में रखकर यह कहानी लिखी गई है। कहानी तन्वी के बहाने अपने समय के एक काले सच को उजागर करती है। कहानी नाट्य रूपांतरण तथा फ़िल्म की पटकथा में ढल जाने की पूरी संभावनाएँ लिए हुए है। "तलाश जारी है" संग्रह की अगली कहानी है। यह कहानी बहुत सामान्य तरीक़े से प्रारंभ होती है लेकिन केवल बातचीत के माध्यम से ही जैसे-जैसे बढ़ती है, वैसे-वैसे दो भिन्न संस्कृतियों की पड़ताल करते हुए चलती है। दो पात्रों के बीच चल रहे संवाद और तीसरे पात्र के दिमाग़ में उन संवादों को लेकर चल रहा द्वंद्व, इसके बाद भी कहानी बहुत अच्छे से बहुत सारी बातों को समझा देती है। यह वास्तव में भारत और अमेरिका के बीच के फ़र्क को तलाशने की कहानी है। कहानी बहुत कड़वे शब्दों में बताती है कि केवल देश बदल लेने से सब कुछ नहीं बदल जाता है। वास्तव में तो वह मानसिकता होती है जिसे सबसे पहले बदले जाने की आवश्यकता होती है। संग्रह की मज़बूत कहानियों में से एक है यह कहानी। "विकल्प" कहानी हंस में प्रकाशित हो चुकी है, और पाठकों द्वारा बहुत पसंद की गई थी। कहानी एक पुराने विषय को नई दृष्टि से देखने की कोशिश करती है। नैतिकता, शुचिता जैसे कई शब्दों को नए सिरे से परिभाषित करती है यह कहानी। समय के साथ जो परिवर्तन आ रहे हैं, उनके परिप्रेक्ष्य में यह कहानी बात करती है मगर इतिहास से लेकर पुराण तक उनके सूत्र तलाशने जाती है। सम्पदा के ऊहापोह तथा उसकी जेठानी का सहजता से सच पर चर्चा करने का भाव, इन दोनों के बीच जो संघर्ष है, उसका चित्रण लेखिका ने बहुत अच्छे से किया है। कहानी का अंत आते तक कथा नायिका सम्पदा के स्थान पर कथा नायिका उसकी जेठानी नीरा हो जाती है। यह "ट्रान्स्फार्मेशन" बहुत कुशलता के साथ लेखिका ने चित्रित किया है।

संग्रह की अगली कहानी "विष बीज" आज के समय में और सामयिक कहानी है। जिस एक कड़वे सच से हमारे समय को सबसे ज़्यादा जूझना पड़ रहा है उसकी बात यह कहानी करती है। कहानी जो कुछ हुआ, जैसे हुआ उसके विवरण में जाने के बजाय पीछे लौटती है और सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर तलाशती है कि क्यों हुआ। असल में क्यों हुआ ही सबसे ज़रूरी प्रश्न होता है, बाक़ी सारे प्रश्न इस एक प्रश्न के सामने बेकार होते हैं। क्यों हुआ प्रश्न हमें समाधान तक ले जाता है, जबकि कब हुआ, कैसे हुआ, कहाँ हुआ जैसे प्रश्न हमें गोल-गोल घुमाने के अलावा और कुछ नहीं करते। एक बलात्कारी की मनोदशा को बहुत संतुलित ढंग से कहानी में वर्णित किया गया है। इस प्रकार की कहानियों में विचलन की पूरी संभावनाएँ रहती हैं, लेकिन लेखिका ने संतुलित तरीक़े से इस विचलन से बचा लिया है कहानी को। अगली कहानी "काश ऐसा होता" बहुत छोटी कहानी है। कहानी उम्र के उत्तरार्द्ध में आने वाले अकेलेपन की कहानी है। उस अकेलेपन का त्रासदी वही जान पाता है, जो उसे भोग रहा होता है। यह कहानी उस त्रासदी का एक सुखद समाधान तलाश कर समाप्त तो होती है, लेकिन अपने पीछे एक प्रश्न छोड़ जाती है कि जो कुछ और जैसा कुछ यहाँ अमेरिका में हुआ, वैसा ही कुछ यदि भारत में भी काश होता, हो सकता। वृद्धजनों का एकाकीपन सारी दुनिया में एक सा ही है। देश बदलने से उसमें कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं आता है। अंतर बस इतना आता है कि कहीं इसका समाधान निकाल लिया जाता है। जैसा इस कहानी में होता है। "क्यों ब्याही परदेश" कहानी भी एक छोटी कहानी है तथा पत्र की शैली में लिखी गई है। सात समंदर पार जा चुकी बेटी का अपनी माँ को लिखा गया यह पत्र संवेदना के धरातल पर चलता है। कहानी "और आँसू टपकते रहे" भी भावनात्मक कहानी है। यह दोनों ही कहानियाँ कुछ पुराने फार्मेट में लिखी गई कहानियाँ हैं। कहानी संग्रह का अंत एक और सशक्त कहानी "बेघर सच" के साथ होता है। कहानी शिल्प के स्तर पर बहुत सुगठित कहानी है। रंजना के सवालों की चुभन को पाठक पूरी कहानी में महसूस करता है। स्त्री का पूरा जीवन इस एक ही सवाल का उत्तर तलाशते हुए बीतता है कि उसका घर कौन सा है, कोई है भी अथवा नहीं है। सुधा ढींगरा ने उस एक प्रश्न को एक बार फिर से रंजना के माध्यम से उठाया भी है और उसका समाधान तलाशने की कोशिश भी की है।

कुल मिलाकर सुधा ओम ढींगरा का यह कहानी संग्रह "सच कुछ और था..." एक पठनीय संग्रह है। संग्रह की कहानियाँ अपने-अपने तरीक़े से कुछ जटिल प्रश्नों से मुठभेड़ करती हैं और पाठक को अपने साथ बहुत ख़ामोशी से उस मुठभेड़ में शामिल भी कर लेती हैं। हर कहानी अपने साथ किसी न किसी सरोकार को लेकर आती है और उसे चर्चा के केंद्र में रखती है। किसी भी लेखक के लिए सबसे ज़रूरी होता है कि वह पाठक को हमेशा अपने साथ रखे। पाठक यदि किसी कहानी को पढ़ते हुए उससे जुड़ाव महसूस करने लगता है तो लेखक का लेखन सफल हो जाता है। "सच कुछ और था..." की कहानियाँ अलग-अलग स्तरों पर घटित कहानियाँ हैं। दो देशों बीच घूमती यह कहानियाँ पाठकों को सतरंगे संसार की यात्रा पर ले जाती हैं।

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डॉ. पुष्पा दुबे, प्रभारी प्राचार्य एवं विभागाध्यक्ष हिन्दी विभाग, शास. चंद्रशेखर आज़ाद महाविद्यालय, सीहोर, मप्र 466001


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