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ISSN 2292-9754

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03.05.2018


डायरी के पन्ने
शावर पर शावर

7/6/2003

 आजकल मुझे बार-बार बेबी शावर में जाने का अवसर मिल रहा है। सच पूछो तो बेबीशावर की उमंग भरी शाम अति प्रिय लगने लगी है। बधाई से, कष्टों से लदी-फदी माँ की कल्पना में वात्सल्य में भीगे असंख्य झुनझुने बजने लगते हैं।

अभी-अभी वैशाली के यहाँ से लौटी हूँ। यह बहू शीतल की सहेली है। दोपहर के क़रीब 2 बजे वैशाली के निवास स्थान पर उसी का बेबी शावर था। इस बार तो मैं अपनी पोती को भी लेकर गई थी। राजस्थानी लहँगा और कुर्ती में उसे देख किसी को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वह डेढ़ मास की है। मैंने तो काली बिंदी उसके माथे पर टिका दी। सब समय कलेजा धड़कता ही रहा कि कहीं किसी की नज़र न लग जाए।

वैशाली के घर पहुँच तो गए पर पर बाहर किसी की कार न देखकर अचकचा गए कि कहीं ग़लत घर तो दस्तक देने नहीं जा रहे हैं। शीतल की जान भी दुविधा में पड़ गई – तारीख़ तो 7 ही बताई थी पर कहीं आज 6 तो नहीं है। मैंने सुझाव दिया, पहले तुम अकेले जाकर पता लगा लो कि ठीक स्थान पर पहुँचे हैं या नहीं। पता लगा सब ठीक-ठाक है। चैन की साँस ली वरना बुद्धू कहलाते।

वैशाली को बहुत दिनों से शौक़ चर्रा रहा था कि कोई उसका बेबी शावर करे। अगले माह तो वह माँ बन ही जाती इसलिए उससे पहले यह रस्म करनी ज़रूरी थी। प्रथम बच्चे के समय यह रस्म माँ को सातवां माह लगने के बाद कभी भी की जा सकती है। दूसरे बच्चे के समय बेबी शावर नहीं होता। पर क्यों? दूसरे बच्चे से इतनी नाराज़गी... क्यों?

प्रतीक्षारत माँ को इस रस्म की सूचना अचानक देकर उसे चकित करना होता है। इस कारण एक दिन वैशाली जब किसी काम से बाहर गई थी, कुछ मित्रों ने उसके पति के सहयोग से इस आयोजन की तैयारी की। उसके घर के आगे किसी ने कार तक खड़ी न की। लौटते समय उसे पता ही न चल सका कि घर के अंदर क्या चल रहा है। दरवाज़े में घुसते ही जब शुभकामनाओं के फूल बरसने लगे तो एक क्षण को तो कुछ समझ ही न सकी पर पलक झपकते ही सत्यता का बोध हुआ तो लज्जा के मारे कपोल लाल हो उठे।

सबके मनोरंजन की व्यवस्था की गई थी जिसमें खेलों का चयन ठीक ही था। काग़ज़ की पट्टी का बंडल मित्रों को देकर कहा गया कि गर्भवती माँ के पेट के घेरे के बराबर पट्टी फाड़ लें। जिसके काग़ज़ की लंबाई ठीक होगी या घेरे के नाप के सबसे ज़्यादा क़रीब होगी उसे इनाम दिया जाएगा।

दूसरा खेल भी कम रोचक न था। एक महिला की पीठ पर बिना उसे बताए किसी प्रसिद्ध हस्ती का नाम बड़े से काग़ज़ पर लिखकर उसकी कमर पर पिन से टाँक दिया और उसकी आँखों पर पट्टी बाँध दी गई। अन्य महिलाओं से प्रश्नों के माध्यम से जानकारी लेकर उसे वह नाम बताना था जिसका बोझा वह कमर पर ढो रही थी। एक-एक करके सब महिलाओं का नंबर आया पर हस्तियों के नाम अलग-अलग थे।

मेरा नंबर भी आया। कमर पर एक काग़ज़ टाँक दिया गया और आँखों पर कस दी पट्टी। अब देखिए प्रश्नोत्तर का मज़ा—

“नाम पुरुष का है या महिला का?” मैंने पूछा।
“महिला,” जबाव मिला।

“जीवित है या मृतक?”

“मृतक।”

“मृत्यु के समय उम्र क्या थी?”

“वृदधा थी। होगी 80 वर्ष की।”

“किस क्षेत्र में प्रसिद्ध थी- अभिनेत्री थी या राजनीतिज्ञ?”

“समाज सुधारक थी।”

“राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त थी या अंतराष्ट्रीय?”

“अंतर्राष्ट्रीय।”

“मृत्यु उसकी कहाँ हुई?”

“भारत”

मुँह से निकाल पड़ा – “मदर टेरेसा।”

ख़ूब मानसिक कसरत हुई। ठीक उत्तर देने पर लगा मानो किला जीत लिया हो।

बेबी शावर से मिलती-जुलती रस्में हमारे भारतीय समाज में भी प्रचलित हैं। गर्भ धारण किए पाँच या सात माह होने पर पंचमासा या सतमासा पूजता है जिसमें गर्भवती महिला नवीन वस्त्र व आभूषणों से अलंकृत हो एक पट्टे पर बैठती है जो रंगबिरंगी अल्पना पूरित स्थल पर रखा जाता है। घर की बहू-बेटियाँ व मित्र-मंडली उसकी गोद में फल मिठाई व सूखा मेवा डालते हैं साथ में धन का आदान-प्रदान होता है जो ख़ुशी और प्रेम का प्रतीक है। शिशु के जन्म से पहले नौंवे मास में अग्नों की रस्म होती है। यह बहुत बड़ा उत्सव होता है। बहू के मायके वाले अनेक उपहार लेकर बेटी को आशीर्वाद देने आते हैं। शिशु स्वागत हेतु विभिन्न उपहारों को देकर उसकी मंगल कामना करते हैं - बच्चा सकुशल हमारी दुनिया में प्रवेश करे और ममता का अंचल लहरा उठे। आजकल यह रीति शिशु के जन्म पश्चात निबाही जाने लगी है। भारत ही नहीं नवशिशु के आगमन के समय संसार के हर कोने में किसी न किसी रूप में ख़ुशियाँ मनाई जाती हैं और मनाई भी क्यों न जाएँ – कोमल श्वेत-गुलाबी मुखड़े वाला बालक तो ईश्वर की अनुपम देन है।

क्रमशः-

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