अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
09.23.2017


एक रेल की दशा ही सारे मानव विकास सूचकांको को दिशा देती है

 ’माय एफ़ एम’ पर भोपाल के पटिये के रूप में बन्ने खां किसी भी समस्या का हल चुटकियों में देते है, बहुधा यह हल फ़न्नी होता है, दिन में कई बार सुनते-सुनते मुझे भी एक प्रेरणा आ गयी। मैंने भी सोचा कि क्यों न समस्याओं के फ़न्नी हल मिनटों में दे दूँ। अब अपने को, माय एफ़एम वालों ने बुलाया तो था नहीं, तो अपन इस व्यंग्य के माध्यम से इसे पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं।

किस देश समाज में विकास कितना हुआ, किस तक कितना पंहुचा, विकास की दौड़ में कौन आगे बढ़ गया, कौन पीछे छूट गया है, विकास की मलाई कौन खा जाता है, छाँछ किसके हिस्से में आती है, कौन पक्के मकान में रहता और महँगे अपेरेल पहनता तो, कौन सस्ते कपडे़ पहनता और खपरैल में रहता है, आदि के आधार पर मानव विकास सूचकांक बना हुआ है। अपना प्यारा वतन बडे़ जतन से इसमे सौ देशों के तो कम से कम बाद में हमेशा अव्वल रहता आया है। सूचकांक के पैमाने माने या न माने बहुत सारे हैं जैसे ग़रीबी, अशिक्षा, लड़कियों की शिक्षा, बीमारी, यातायात, मकान, व्यवसाय, मनोरंजन और न जाने कितने हैं। फिर इसके लिये जा कर हर बार सर्वे करो विश्लेषण करो, तुलना करो, माथापच्ची सब तरह से करो तब कहीं रिपोर्ट बन पाती है, और फिर अलग-अलग पायदानों पर अलग-अलग देश आते हैं। हम तो कह ही चुके हैं कि हमारा वतन बडे़ जतन से सौ के बाद इसमें पहला आता है। इस सब में ग़रीब देशों का कितना पैसा, संसाधन ख़र्च होता है कि वे इसका सर्वे करवाते-करवाते एक दो पायदान और नीचे खिसक आते हैं।

गंगू ने ’बन्ने खां’ की तर्ज़ पर इसका एक आसान सा तरीक़ा निकाल लिया है! जिससे यह पता चल जायेगा कि किसी देश में ख़ासकर के भारत टाईप के में कितने लोगों ने कितनी प्रगति की है। कितने ग़रीब हैं, कितने मध्यमवर्ग में हैं कितने अमीर हैं, और ग़रीबों व अमीरों में अल्ट्रा पूअर व रिच कितने है!

हमें कुछ नहीं करना है, केवल सबके द्वारा समय-समय पर कोसे जाने वाली, भले ही सबको दिन रात उसके द्वारे पहुँचाने में लगी भारतीय रेल को सामने रखकर छोटी-छोटी बातें समझनी हैं, कुछ छोटे व नाना तरह के सर्वे इसके व इसमें यात्रा करने वाले नाना तरह के नगीने यात्रियों के करने हैं! सर्वे के बाद ऐसे विनिश्चय आयेंगे।

यदि देश में पैसेंजर ट्रेनों की संख्या एक्सप्रेस व सुपर फ़ास्ट से ज़्यादा है तो देश आज भी ग़रीब व अविकसित है!

यदि इनकी संख्या कम हो गयी है। उदाहरण ले लेते हैं, कि यदि रोज़ ग्यारह हज़ार ट्रेनें देश में चलती हैं, यदि इन में से कम से कम छह हज़ार ट्रेनें एक्सप्रेस हो गयी हैं, तो मतलब निकल सकता है कि हम अविकसित से विकासशील की ओर अग्रसर हैं!

 और यदि सारी ट्रेनें एक्सप्रेस हो गयी हैं तो हम विकासषील की जगह विकसित की ओर अग्रसर हैं। और यदि सारी ट्रेनें सुपर फ़ास्ट हो गयी हों, राजधानी व शताब्दी की तर्ज़ पर, तो तो देश विकसित हो गया है, यह माना जा सकता है। हाँ सारी बुलेट व सेमी बुलेट हो जायें तो देश अति विकसित की श्रेणी में खड़ा हो जायेगा तब कोई भी देश में रेल में खडे़ होकर यात्रा भी नहीं करेगा।

अब ट्रेनों में डिब्बों के पैमाने पर तुलना कर लें। यदि आज भी ट्रेनों में सामान्य कोच लग रहे हैं, तो इसका मतलब आज भी देश में ग़रीबी विद्यमान है। और कितनी है यह एक ट्रेन में सामान्य कोचों की कुल संख्या पर निर्भर करती है, यदि दो या तीन हैं हर ट्रेन में जो कि कई सालों से हम देख रहे हैं तो फिर ग़रीबी यथावत है, उसकी रेखा के नीचे दबने वालों की संख्या बढ़ रही है! भले ही प्रतिशत कम हो गया हो! लेकिन पहले स्थिति और बदतर थी जब ट्रेन में जनरल कोच ज़्यादा व स्लीपर या आरक्षित कम होते थे मतलब पहले ग़रीब ही ग़रीब सब ओर थे। जिस दिन एक मात्र सामान्य कोच एक लम्बी ट्रेन में रहेगा तो मान सकते हैं कि पाँच दस प्रतिशत से अधिक लोग अब ग़रीबी रेखा के नीचे देश में नहीं हैं। और फिर आ जायें स्लीपर कोच पर यदि इनकी संख्या एसी की तुलना में तीन चार पाँच गुनी है, तो इसका मतलब है कि देश अभी विकासशील ही है, अपने शील की रक्षा करने में ही लगा है! विकसित होने में समय है। मध्यम वर्ग कोशिश रत है उच्च वर्ग में शिफ़्ट होने को मतलब धनी होने को।

लेकिन यदि स्लीपर कोच व एसी कोचों की संख्या बराबर हो गयी है, तो मतलब देश में काफ़ी विकास हो गया है! बहुत से लोग स्लीपर से एसी में शिफ़्ट हो गये है यानि कि इनकी आय कुछ ऊँचे स्लेब पर शिफ़्ट हो गयी है। यदि तीन जनरल कोच, व शेष में आधे स्लीपर व आधे एसी तो मतलब देश में ग़रीब, मध्यम वर्ग व अमीर लगभग बराबर-बराबर है। लेकिन यदि अभी के एसी कोचों की संख्या जितने स्लीपर रह जायें मतलब तीन चार पाँच तो मतलब देश ने काफ़ी प्रगति कर ली है! अधिकांश लोगों की आय बढ़ गयी है। एक ट्रेन में जैसे आज सबसे अधिक स्लीपर कोच होते हैं तो उस समय सबसे अधिक एसी कोच होंगे!

एक और स्थिति पर गंगू विचार करने का विन्रम निवेदन सुधिजनो से करता है! कि देश विकसित होना कब माना जायेगा? जब सारी ट्रेनें राजधानी या शताब्दी की तरह हो जायेंगी, मतलब पूरी तरह वातानुकूलित। और यह जब होगा तब सब आयकर दाता होंगे।

अब यदि हमारे देश को अमेरिका या स्विट्जरलेंड जैसा अति धनी व अतिविकसित बनना है तो सभी ट्रेनों में केवल व केवल एसी कोचेस वो भी एसी वन होंगे। यह ऐसा समय होगा जब लोगों की आय इतनी ज़्यादा हो जायेगी कि वे थर्ड एसी को समाप्त करने की बात करेंगे और रेल्वेज़ को इस पर ध्यान देना पडे़गा, क्योंकि लोग इसमे यात्रा ही नहीं करेंगे। अभी सबसे पहले एसी थर्ड आरक्षित होता है। उस समय सबसे पहले एसी वन होगा! फिर मजबूरी में लोग एसी टू आरक्षित करवायेंगे और लोग यात्रा केंसल करना या अन्य साधन से करना पसंद करेंगे लेकिन एसी थर्ड की जिल्लत नहीं झेलना चाहेंगे।

देश में कोई ग़रीब नहीं है? यहाँ तक कि मध्यम वर्ग भी समाप्ति पर है! मतलब कि सब धनी होने की ओर अग्रसर हैं!! यह कब होगा जब सारी ट्रेनें धीरे-धीरे बुलेट ट्रेनों या सेमी बुलेट ट्रेनों जैसी हो जायेंगी जिनकी टिकट भी दो पाँच हज़ार से कम नहीं होगी। सोचें ग्यारह हज़ार के लगभग बुलेट व सेमी बुलेट ट्रेनें! ना मुमकिन नहीं है, यह ’जब एक पत्थर तबियत से उछालने से आसमान में, सुराख हो सकता है, तो जमीन में सुराख यानी सुरंगे बनाकर बुलेट ट्रेनें क्यों नहीं चल सकती है’!

अब एकमात्र रेल का पैमाना ही सारे सूचकांको के बरोबर है तो फिर काहे को ज़्यादा मेहनत का टेंशन लेने का।

गंगू से आप यह सवाल पूछना चाह रहे हैं कि अभी देश किस श्रेणी में है? अरे इतना बताये फिर भी कनफ्यूजन कैसे हो रहा है ? आज भी अधिकांश ट्रेनों में स्लीपर कोचो की संख्या ज़्यादा है, जनरल कम से कम दो तीन है, एसी भी सामान्यातया इतने ही हैं। तो मतलब देश आज भी ग़रीब ही है, लेकिन स्लीपर क्लास की अधिकता बताती है कि मध्यम वर्ग काफ़ी है देश में। और कई ट्रेनों में एसी पहले के एक की जगह अब चार पाँच तक हो रहे हैं तो मतलब स्पष्ट है कि तेज़ी से मध्यम वर्ग धनी वर्ग में रूपांतरित हो रहा है!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें