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ISSN 2292-9754

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04.20.2018


मैं और हर दूसरा कोई

मैं कौन हूँ?
या हर दूसरा कोई कौन है?
बस कुछ रेत,
कुछ बूँदें,
एक हादसे से दूसरे हादसे तक,
बे वजह सफ़र करते हुए,
बे-नाम तिनके।

ज़ाया आदतों के पसीने पोंछते हुए
ऐसे अगिनत चेहरे मिलेंगे तुम्हें,
बस, ट्रेन और नुक्कड़ पर।
हर चेहरा
बाहर से दृढ़,
अंदर से टूटा।
एक ही सा लाचार।
अपने आप से एक ही सा नाराज़॥
थका सा, सहमा सा।
तनहा सा, तिनका सा,

मैं,
और हर दूसरा कोई॥


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