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ISSN 2292-9754

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05.04.2016


कुछ भी हो, अपने मसीहा को

कुछ भी हो, अपने मसीहा को बड़ा रखता है
आदमी अपनी ही मर्जी का ख़ुदा रखता है।

वो सरेआम हक़ीक़त से मुकर जायेगा
गिरगिटों जैसी बदलने की अदा रखता है।

तुम ग़रीबी को तो इनसान का गहना समझो
जो फटेहाल है वो लब पे दुआ रखता है।

ज़ुल्म पर ज़ुल्म जो करता है यहाँ दुनिया में
उसके हिस्से में भी भगवान सज़ा रखता है।

मार के कुंडली, खजाने पे अकेला बैठा
हक़ ग़रीबों का यहाँ सेठ दबा रखता है।

एक दिन मैं तुझे आईना दिखा दूँगा "सुजान "
मेरे बारे में जो तू ख्याल बुरा रखता है।



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