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ISSN 2292-9754

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07.04.2016


उत्तर ओड़िशा के आदिवासियों का प्रसिद्ध उड़ा पर्व

ओड़िशा में लगभग ७० प्रजाति के आदिवासी निवास करते हैं। उनमें से मयूरभंज में संथाल, संबलपुर में शवर और कुली आदिवासी, कालाहांडी में गंड आदिवासी और कोरापुट ज़िले में वंडा, परजा, गदवा आदिवासियों की संख्या अधिक पायी जाती हैं। इसके अलावा नाएक, भूयाँ, साऊँटी, वाथुड़ी, कोल, माझी और महंत आदि अन्य कई जनजातियाँ ओड़िशा में कई सालों से रहते आ रहे हैं। इन आदिवासियों की विशिष्ट जीवन शैली, संस्कृति और परंपरा इन्हें समाज में एक अलग पहचान देती है। अन्य संप्रदाय के लोगों की तरह इनके भी अपने जीवन-यापन के तौर-तरीक़े हैं। ये लोग भी साल के बारह महीने में तेरह त्यौहार मनाते हैं।

आदिवासियों के संस्कृति से हम उनके जीने की तरीक़े, देवी-देवताओं के ऊपर अटल विश्वास, इनके पर्व पालन और सामाजिक जीवन के अंदर उन तमाम कार्य जो उनके जीवन को दु:ख-यंत्रणा का एहसास तो कराता है पर साथ ही ख़ुशियों से भी भर देता है। विवाह से लेकर जन्म और मृत्यु संस्कार तक कई रीति-रिवाज़ इनकी संस्कृति में देखने को मिलते हैं। ओड़िशा में वसे हुए आदिवासी लोग कई तरह के पर्व पालन करते हैं जैसे- करम पर्व, केडु पर्व, सरहुल पर्व, हो पर्व, चैत्र पर्व आदि। इनमें से "उड़ा पर्व" आदिवासियों का एक प्रसिद्ध पर्व है। यह पर्व हर साल अप्रैल के महीने में मनाया जाता है। इसे "महा विषुब संक्राती" के नाम से भी जाना जाता है। ओड़िया माह के अनुसार यह पर्व चैत्र माह में मनाए जाने से इसे "चैत्र पर्व" के नाम से भी जाना जाता है। ओड़िशा में बसे आदिवासियों के लिए चैत्र माह साल का प्रारम्भिक महीना होता है। हालाँकि इस महीने की संक्रांति से ओड़िया नव वर्ष का आरंभ भी माना जाता है। असह्य गर्मी से जीव जगत को बचाने के लिए, इस संक्रांति के दिन से पूरे एक महीना पेड़-पौधों, जीवजगत को जलदान किया जाता है इसलिए इसे "जल संक्रांति" भी कहा जाता है।

"उड़ा पर्व" आदिवासियों के लिए एक मुख्य पर्व है। यह पर्व ओड़िशा के अलावा अन्य कई स्थान पर मकर संक्रांति के विदाई और माघ माह की स्वागत में मनाया जाता है। पर ओड़िशा में यह त्यौहार "महाविषुव संक्रांति" या "पणा संक्रांति" के दिन बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। सूर्य की असह्य गर्मी से राहत पाने के लिए इस दिन बेल, दही और गुड़ को मिला कर पीते हैं, जिसे ओड़िया भाषा में "पणा" कहा जाता है। इसलिए इसे "पणा संक्रांति" भी कहा जाता है। मुख्यत: उत्तर ओड़िशा के मयूरभंज और केंदुझर जिले में यह उड़ा पर्व बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। मयूरभंज के "ठाकुरमुंडा" एक आदिवासी बहुल अंचल है। उस अंचल में बसे हुए आदिवासी संप्रदाय के लोग इस पर्व को बड़ी श्रद्धा के साथ मनाते हैं।

आदिवासी लोग इस पर्व में देवी "वासुली" (काली) को पूजते हैं। इन लोगों के लिए वासुली देवी शक्तिशाली देवी है। उन्हें वह हर विपत्ति से उद्धार करेंगी। उनके पास की गई हर मनोकामना पूरी हो जाती है। आदिवासी लोग साल भर अपनी सुख समृद्धि के लिए मन्नत करते हैं और मन्नत पूरी होने पर वे इस संक्राती के दिन माता के सामने उड़ते हैं। इस पर्व में सिर्फ आदिवासी पुरुष की भागीदारी देखने को मिलती है। केवल पुरुष ही व्रत धारण कर सकता है। यह हमारे समाज की विडम्बना है। सिर्फ पुरुष ही पूजा कर सकता है।

इन व्रतधारियों को "भक्त" या "भोक्ता" कहा जाता है। "पणा संक्रांति" के पंद्रह दिन पहले से भक्त व्रत रखता है और देवी की आराधना करता है। इन व्रत रखने वाले लोगों को "पाटुआ" कहा जाता है। ये लोग संक्रांति के दिन उपवास करते हैं और परंपरा के अनुसार नदी में सब व्रत रखने वाले भक्त स्नान करते हैं। इस पर्व के पुजारी "देऊरी" जाति का होता है। देऊरी के अनुसार सारा रीति-रिवाज़ किया जाता है। भक्तों को ढोल-मृदंग बजाकर मंत्रों के उच्चारण के साथ देवी के मंदिर के सामने लाया जाता है। मंदिर में पूजा की जाती है। पूरे दिन भक्त लोग मंदिर में देवी की आराधना करते हैं। उड़ने का पर्व रात के दस बजे के बाद शुरू होता है।

मंदिर के सामने एक बड़ी-सी लकड़ी का खंबा गाड़ दिया जाता है। खंबे के ऊपर एक बाँस बाँध कर उसमें रस्सी लगती है और बाँस के दूसरी ओर एक रस्सी लगाई जाती है जिसके सहायता से बाँस को घुमाया जा सके। पूजा-अर्चना के बाद भक्त या "पाटुआ" के पीठ पर बड़े-बड़े कांटे गाड़ दिये जाते हैं और उसमें रस्सी बाँधकर सीधा ऊपर उठाकर सात से इक्कीस बार गोल-गोल घुमाया जाता है।

व्रतधारी उड़ते समय कुछ फूल नीचे खड़े हुए लोंगों के ऊपर फेंकता है उन फूलों को लेने में भक्तों की भीड़ लग जाती है। कहा जाता है की "पाटुआ" भक्तों में स्वयं देवी रहती हैं। लगभग आठ से नौ फुट ऊपर लेकर उन्हें उड़ाया जाता है। उसके बाद पाटुआ को उससे मुक्त किया जाता है और वह पूरा महीना गाँव में घूम कर पाटुआ नृत्य और गाना गाता है।

भक्त उड़ने के बाद उनके पीठ से काँटे को निकाल कर उनमें पूजा किया गया सिंदूर लगा दिया जाता है जिससे उनका ज़ख्म भर जाए और उनको आराम मिले। किसी दवाई की ज़रूरत नहीं होती है। अन्य कुछ व्रतधारी काँटे और जलते हुए अंगारों में भी चलते हैं। यह सब करने के बाद भक्त लोग वासूली माता के मंदिर में प्रार्थना करते हैं। अगले दिन सुबह सारे पाटुआ मंदिर में जाते हैं। माता की पूजा होने के बाद एक बकरी की बली दी जाती है। कहा जाता है कि इससे देवी प्रसन्न होती हैं और हर दुख:, कष्ट से अपने भक्तों की रक्षा करती हैं। सूखा उस अंचल को छू भी नहीं पाता है।

इस अंचल के आदिवासी लोग प्रमुखतः कृषि के रूप में मक्का, कंदमूल, धान आदि उगाते हैं। इसके अलावा जंगल जात फल-फूल खाकर और जंगल से शाल के पत्ते तोड़कर उसे बेचते हैं, यह उनकी रोज़गार की प्रमुख आधार है। इस तरह ये लोग जीवन यापन करते हैं।

इधर प्रश्न उठता है कि यह उड़ने का पर्व उस अंचल में शुरू कैसे हुआ? उसके पीछे क्या वज़ह है? उस अंचल में बसे हुए आदिवासी लोगों से बातचीत करने से पता चलता है कि- "हर साल वहाँ दुर्भिक्ष पड़ता था। लोगों को खाना नहीं मिलता था। खेत में उगी हुई फ़सल नष्ट हो जाती थी। उस अंचल के चारों ओर खाने के लिए कुछ नहीं मिलता था। एक आदिवासी पुरुष ने अपनी फसल बचाने के लिए वासुली माता के पास मन्नत रखी और प्रार्थना किया, कि अगर उसकी मन्नत पूरी हो जाए तो वह "पणा संक्रांति" के दिन अपने शरीर में कांटे फोड़कर मंदिर के सामने खंभे के सहारे झूलेगा। समय बितता गया और उस साल फसल अच्छी हुई। द्रुभिक्ष नहीं हुई। सब खुशी से रहने लगे। तब से यह परंपरा चली आ रही है”। अब यह पर्व आदिवासियों के लिए एक अहम पर्व बन गया है। मयूरभंज के अलावा सुंदरगड़, केन्दुझर, झारसुगुड़ा आदि अन्य कई जगह पर भी यह पर्व आदिवासियों द्वारा मनाया जाता है।

संदर्भ ग्रंथ सूची-

1. आदिवासी- ओड़िशा आदिवासी गवेषणा परिषद, आदिवासी और ग्राम मगंल विभाग, ओड़िशा सरकार
2. ओड़िशा के जनजाति: समाज, संस्कृति, भाषा और उन्नयन (पत्रिका)
3. ठाकुर मुंडा अंचल के निवासी "चकरा नाएक" से बातचीत

स्मृतिरेखा नायक
शोधार्थी (हिन्दी विभाग)
हैदराबाद विश्व विद्यालय
मो.8331922401
Email- smruti032@gmail.com


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