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ISSN 2292-9754

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08.27.2016


जज़्बात दिल में अगर

रोटी खाने को कम है बची थालियाँ
बात रोने की है और बजी तालियाँ

ज़िन्दगी में भरोसा न टूटे कभी
अच्छी बातें भी लगती तभी गालियाँ

फर्क ससुराल, शमशान में कुछ नहीं
खोजने से जहाँ न मिली सालियाँ

थी हुकूमत की कोशिश नहर के लिए
सोचाता हूँ वहाँ क्यों बनी नालियाँ

बदले हालात, जज़्बात दिल में अगर
बिन सुमन के कहीं क्या सजी डालियाँ



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