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ISSN 2292-9754

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08.27.2016

चुभन
श्यामल सुमन

अब तो बगिया में बाज़ार लगने लगा।
वह सुमन जो था कोमल वो चुभने लगा।।

आये ऋतुराज कैसे इजाज़त बिना।
राज दरबार पतझड़ का सजने लगा।।

मुतमइन थे बहुत दूर में आग है।
क्या करें अब मेरा घर भी जलने लगा।।

जिस नदी के किनारे बसी सभ्यता।
क्यों वहाँ से सभी घर उजड़ने लगा।।

मिले शोहरत को रक्षक है इज़्ज़त नगन।
रोज माली चमन को निगलने लगा।।

बात अधिकार की जानते हैं सभी।
अपने कर्तव्य से क्यों मुकरने लगा।।

भला चुप क्यों रहूँ कुछ मेरा हक़ भी है।
इनसे लड़ने को मन अब मचलने लगा।।
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