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ISSN 2292-9754

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01.17.2018


व्यवस्था की क्रोड़ में फँसे हिंदी के पाठक

 देश की अस्मिता एकता की जब-जब बात उठती है, तब हमें याद आता है हमारा राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगीत और राष्ट्रभाषा। भला हो उन प्रशासकीय नीतियों का जिसके कारण साल में दो बार हम राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगीत से अभिमान के साथ मुखातिब होते हैं। इस मायने में हमारे लिए सबसे नज़दीक हमारी राष्ट्रभाषा है, जो संविधान तो नहीं पर भारतीय जनविधान के कारण हिंदी है; सो भी विवाद की झालर के साथ। ऐसे में आपके द्वारा पूछा शीर्षक सार्थक होता है कि हिंदी कहाँ है,हिंदी के पाठक कहाँ है?

‘ग्लोबलायज़ेशन’ शब्द के उच्चारण के साथ हमारी छाती फूल जाती है। हम अपने आप को विश्व का हिस्सा मान लेते हैं। किन्तु हमारी भाषाओं को छोड़ वैश्विक मंच पर अंतर्राष्ट्रीय भाषा के सिंहासन पर आरूढ़ अंग्रेज़ी को अहम मान उससे अपना रिश्ता बना लेते हैं। पर सवाल यह है कि जिन हिंदी के पाठकों का मैं विचार कर रही हूँ, उनकी पहचान क्या बताऊँ? क्या यह वे लोग हैं, जिनके लिए हिंदी मातृभाषा तो है; पर वे हिंदी का प्रयोग करने में हिचकिचाते हैं? क्या ये वे हैं जिनकी मातृभाषा हिंदी न होकर भी वे चाव से हिंदी सीख रहे हैं पर बोलने में उतने सक्षम नहीं? फिर ये कौन सी हिंदी है? शायद यहाँ हिंदी का मुद्दा भाषा के रूप में बोलने-समझने तक सीमित नहीं है। मैं उस हिंदी को देखती हूँ, जो सिर्फ़ संचार-संवाद माध्यमों तक ही नहीं, उसके भी आगे है। मैं उस हिंदी की बात करती हूँ, जिसमें हमारे देश के पंतप्रधान जो चाहे श्री. अटलबिहारी वाजपेयी जी हों या श्री. नरेंद्र मोदी जी अंतर्राष्ट्रीय मंच से दहाड़ते हैं। जिसके होने से रिश्तों का गहरापन, रुचि और हमारे अस्तित्व का एहसास हमें रोमाँचित कर विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन तक एक साथ आने के लिए जुटाता है। पर ऐसी एक-दो बातों के अलावा हिंदी प्रेमी कहीं उभरते नहीं।

आँकड़ों के रूप में हिंदी की स्थिति कभी ख़ुशी-कभी ग़म वाली है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की 1.2 अरब आबादी में से 41.03%आबादी की मातृभाषा हिंदी थी। ज़ाहिर है यह संख्या उत्तर भारत की जनसंख्या पर अधिक आधारित है। वहीं हिंदी को दूसरी भाषा के रूप में स्वीकारने वालों का कुल प्रतिशत 2011 में 75 फ़ीसदी था। अर्थात हिंदी भाषा की स्थिति में प्रांतीय पक्ष अहम् भूमिका निभाते हैं। मात्र वर्तमान समय में अहिन्दी क्षेत्र में प्रान्तिक भाषाओं के प्रति अभिमान ने अहंकार का रूप लेकर हिंदी की स्वीकृति पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं। जिसके पीछे राजनीति की दुर्भावना भी है, जो अपने अहंकार के तुष्टिकरण के लिए भाषाओं का लड़ा रही है, हिंदी का विरोध कर उसे प्रांतीय सभ्यता-संस्कृति की विरोधी होने की अफ़वाह उठा रही है।

भारतीय नेताओं द्वारा भी कई बार हिंदी को जान-बूझकर बगल में कर देने की कोशिश होते देखा जा सकता है। जबकि अंतर्राष्ट्रीय मंच से वे चाहे तो बड़ी सहजता से हिंदी को उसका वैभव व स्थान दिला सकते हैं। किंतु इतिहास में झाँकने पर इस दृष्टि से निराशा ही हाथ आती है। 1977 में जनता सरकार में विदेश मंत्री रहे श्री. अटलबिहारी वाजपेयी जी ने यू.एन. में अपना पहला भाषण हिंदी में ही दिया था। जिसके चलते पहली बार यू.एन. जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंच से भारत की राजभाषा हिंदी की आवाज़ गूँजी थी, जब कि देश को आज़ाद हुए तब पूरे 30 साल का समय बीत चुका था। 25 वर्ष बाद पंतप्रधान पद पर आसीन वाजपेयी जी के द्वारा 2002 में, तो उसके 15 साल पश्चात पंतप्रधान श्री. नरेंद्र मोदी जी के द्वारा हिंदी में यू.एन. में भाषण हुए। इस दौरान हिंदी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर कहाँ थी? बावजूद इसके भारत में अपने लिए एक बड़ी अर्थव्यवस्था की संभावना में विदेशों में हिंदी का अध्ययन-अध्यापन शुरू हुआ। दूसरी ओर हिंदी की फ़िल्मों ने अपने जादू से विदेशियों के दिल छू लिए। जिसके चलते रूस में न सिर्फ़ भारत बल्कि हिंदी के कई गीतों के लिए दीवानगी आज भी देखी जा जाती है। मॉरिशस देश की सरकार ने स्कूलों में छठी कक्षा तक हिन्दी पढ़ाने की व्यवस्था की है। 1961 में वहाँ मॉरिशस हिन्दी लेखक संघ की स्थापना हुई, जो प्रतिवर्ष साहित्यिक प्रतियोगिताओं, कवि सम्मेलनों, साहित्यकारों की जयंती आदि का आयोजन करता है। गत कुछ दिन पहले हैदराबाद में आयोजित 28 से 30 नवंबर 2017 के बीच आयोजित ग्लोबल एंटरप्रेन्योर समिट में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप के साथ अमेरिकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हेलेना व्हाइट भारत दौरे पर आईं थीं। इस दौरान उन्होंने न्यूज़नेशन नामक चैनल के साथ हिंदी में बात कर यह दर्शाया कि अमेरिका और विश्व पटल पर हिंदी का क्या स्थान है। पर दुर्भाग्य से हम भारतवासी ही इसे नहीं समझ पा रहे हैं।

साहित्य दुनिया में हिंदी की दीवानगी कम न थी। जब उर्दू भाषा-भाषी के दौर में बाबू देवकीनंदन खत्री ने देवनागरी हिंदी के प्रचार-प्रसार को अपना मुख्य लक्ष्य बनाते हुए चंद्रकांता उपन्यास जैसी रचना की, जिसकी लोकप्रियता से जो लोग हिंदी लिखना-पढ़ना नहीं जानते थे, उन्होंने भी इसे पढ़ने के लिए हिंदी सीखी। मात्र दुर्भाग्य से हिंदी के पाठक बढ़ाने वाला यह चमत्कार वर्तमान समय में किसी रचनाकार के द्वारा नहीं हुआ। मूल्यहीन साहित्य, आलोचकों का तयशुदा काम और सस्ते मनोरंजन ने हिंदी साहित्य की पठनीयता पर ही सवाल उठा दिए। वहीं दूसरी ओर हिंदी में छपने वाले दैनिक पत्र-पत्रिकायें हिंदी की स्थिति को दृढ़ रखने की आशा दिखाए हुए हैं। 2016-17 में हिंदी में पंजीकृत पत्रिकाएँ, जो उस वर्ष की अन्य भाषाओं की तुलना में सबसे अधिक थीं, की संख्या 46,587 थी, वहीं अंग्रेज़ी पत्रिकाओं की संख्या 14,365 थी। इनमें सबसे अधिक पंजीकरण उत्तरप्रदेश से हुआ था, जो एक हिंदी भाषी क्षेत्र है। जब कि महाराष्ट्र इसमें दो नंबर पर था, जो अहिंदी क्षेत्र में हिंदी की स्थिति पर थोड़ा चिंतनीय विषय है। इसी वर्ष पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन का जो दावा किया गया, उनमें हिंदी में हुए कुल प्रकाशन 23,89,75,732 था, जो अंग्रेज़ी की तुलना में काफ़ी सुखात्मक था। तो अख़बारों की दुनिया में दैनिक भास्कर इस हिंदी अख़बार के 47,36,785 संस्करण निकले, जब कि अंग्रेज़ी अख़बार इससे मात्र लगभग 5 लाख आँकड़े से पीछे थे। हिंदी के पाठक बढ़ाने में अंतर्जाल की कई पत्र-पत्रिकाएँ भी सहायक हुई हैं, जहाँ हिंदी में लेखन हेतु नये लेखकों का अह्वान तो किया जाता है, पर प्रस्थापित लेखकों के सामने उन्हें मिलने वाले मौक़े कम ही नज़र आते हैं। मात्र इन पत्र-पत्रिकाओं या अख़बारों को कभी बारीक़ी से देखा है, कि इसकी भाषा हिन्दी ही है? संचार माध्यम के ये सशक्त रूप धीरे-धीरे हिन्दी के मूल शब्दों की जगह अंग्रेज़ी के शब्दों की मिलावट कर शुद्ध हिन्दी भाषा का व्यंग्य और सर्वसामान्य पाठक के मन में उसके प्रति डर बैठा रहे हैं।

हिंदी की दुविधा को बढ़ाने के लिए हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था भी कम कारणीभूत नहीं है। हमारे स्कूल के बच्चे हिंदी के नाम पर नाक- भौंह सिकोड़ते हैं। अंग्रेज़ी माहौल में पलने-बढ़ने वाले ये बच्चे ह्रस्व-दीर्घ की मात्रा, उच्चारण से इतना भय खाते हैं कि इन ग़लतियों से निजात पाने वे हिंदी से ही रिश्ता तोड़ने का निर्णय ले लेते हैं, जो आगे चलकर हिंदी के प्रति गहरी अरुचि को उत्पन्न कर रहे हैं। ऊपर से हिंदी पढ़ने का अर्थ अपने आप को कम वर्ग से समझना, यह नया विचार भी बच्चों की दुनिया में न जाने कहाँ से पैदा हो गया है? ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हिन्दी लगतार कमज़ोर हो रही है। सरकारी कार्यालय में हिन्दी की उपेक्षा और भाषा से जुड़े रोज़गार के क्षेत्र का विशेष आकलन न होने के कारण हिंदी जैसी विस्तृत भाषा का कामचलाऊ ज्ञान पाने पर ही देश का नवयुवा ज़ोर दे रहा है। संपर्क माध्यमों ने तो हिन्दी को देवनागरी की जगह रोमन लिपि में लिखने का चलन शुरू चलते हिंदी साहित्य के पठन-पाठन अनदेखा हो रहा है। हिंदी के पाठक बढ़ाने हेतु सबसे पहले नई पहल शिक्षा व्यवस्था से करनी होगी। पाठ्यक्रम की हिंदी में बदलाव, संशोधन के सुझाव वास्तव में अमल में आने चाहिएँ। वह नीरस पाठ, कविताएँ जो बौद्धिक विलक्षणता को तो दर्शाती हैं, पर सर्वसाधारण पाठकों को उबा देती हैं। इतना ही नहीं उन्हें समझने के लिए डिक्शनरी खोलने की नौबत आये, ऐसी रचनाओं को पाठ्यक्रम में स्थान देने से पहले, उसके विद्यार्थियों की पात्रता जाँची जाए।

हिंदी की ओर केवल बच्चे ही नहीं, सर्वसाधारण पाठक भी आकर्षित हो, यह हमारी सबकी प्राथमिकता है, अतः रचनाकार अथवा पाठ्यक्रम निर्धारित करने वाले अहिंदी क्षेत्र की भाषिक समस्याओं का भी आकलन हो। डिग्री के मात्र कागद की चाह में साहित्य पढ़ने वालों में वास्तविक रुचि लाना अध्याता की भी ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। ताकि भविष्य में 14 सिंतबर का हिंदी दिन मनाने के लिए हमें किसी को खींच-तानकर, ज़बरदस्ती से बिठाने की नौबत न आये।

संदर्भ सूची -

• पत्र सूचना कार्यालय, भारत सरकार सूचना - स्मृति जुबिन इरानी प्रेस इन इंडिया रिपोर्ट सूचना एवं प्रसारण मंत्री को प्रस्तुत की गई -15-दिसंबर-2017 20:40 IST

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डॉ. श्वेता चौधारे
हिन्दी विभागप्रमुख
कला,वाणिज्य व विज्ञान महाविद्यालय,
सोनई, जिला-अहमदनगर, महाराष्ट्र


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