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ISSN 2292-9754

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04.30.2016


शारदा शुक्ला की "कलम की कॉकटेल": एक समीक्षा

समीक्ष्य पुस्तक: कलम की कॉकटेल
लेखिका: शारदा शुक्ला
प्रकाशक: अंतिका प्रकाशन
सी-56/यूजीएफ-IV, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-II,
गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)
मूल्य: रूपए 225

11वें विश्व हिंदी दिवस के मौके पर उपन्यासकार नरेंद्र कोहली ने मीडिया जगत से जुड़ी लेखिका शारदा शुक्ला के लेखों के संकलन कलम की कॉकटेल का विमोचन किया। इस पुस्तक में शारदा ने अपने पुराने प्रकाशित आलेखों, साक्षात्कारों और कुछ अहम विषयों पर किए गए कार्यों से मिले अनुभवों को साझा किया है।

लखनऊ दूरदर्शन से लेकर वर्तमान में “आजतक” हिन्दी चैनल के सफ़र तक टेलिविज़न की दुनिया में प्रोफ़ेशनल प्रोड्युसर के नाम से अपनी प्रतिभा का परिचय प्रमाणित कर चुकीं कर्मठ नवोदित शारदा शुक्ला जी की अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित प्रथम पुस्तक "कलम की कॉकटेल" अक्षरशः अपने शीर्षक को सार्थक करती है। आयुर्वेद में चार तरह की मदिराओं का उल्लेख मिलता है क्रमशः मैरेय, आसव, कोहल और सुरा। आसव और सुरा दोनों को मिलाने से मैरेय बनाया जाता था क्योंकि प्रायः आसव का प्रयोग अकेले औषध के रूप में किया जाता था और मद्यपान हेतु इसे सुरा में मिलाकर मैरेय रूप में इसका पान किया जाता था। मैरेय को आजकल की भाषा में कॉकटेल कहते हैं अर्थात् शब्दार्थ रूप में कॉकटेल "मद्य मिश्रित पेय" कहा जा सकता है। "कलम की कॉकटेल" पुस्तक में भी सरोकार, धरोहर, परा-विज्ञान, उमंग, धर्म और निर्झरणी जैसे आसव विषयों को सिनेमा जैसे सुरा-विषय की संतुलित मात्रा के साथ साहित्य की विविध विधाओं रूपी सुरा-पात्रों में पिलाए गए क़लम-मधु की अलौकिक आनंदानुभूति से पाठक सराबोर हुए बिना नहीं रह सकते।

पुस्तक को साहित्य शिरोमणि पटकथा लेखिका डॉ. अचला नागर, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट पत्रकारिता के जाने-माने स्तम्भ पुण्य प्रसून वाजपेयी, उर्दू की मशहूर शख़्सियत शकील शमसी और लेखिका के मनीषी पिता श्री रघोत्तम शुक्ल जी के आशीर्वचनों का सौभाग्य मिला है।

साहित्य समाज का दर्पण होता है, इस कथन को पूर्णता देते हुए शारदा जी ने मानव तस्करी, ऑनलाइन वोटिंग, आरक्षण जैसे ज्वलंत उदाहरणों पर अपनी क़लम चलाई है, तो वहीं सतीप्रथा जैसी कुप्रथा के शेष अवशेषों की चिंगारियों के पूरी तरह न बुझ पाने की आशंका से इंकार भी नहीं किया है। समय के साथ-साथ सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार साहित्य में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। साहित्य परिवर्तनशील होने के कारण सांकेतिक रूप में मौन साधे हुए भी विद्रोह की बोली बोलता रहता है। विधाओं की शैलीय परम्पराओं को तोड़ती यह पुस्तक रचनाओं को किसी भी सीमित दायरे से बाहर निकालते हुए साक्षात्कार से लेकर आलेख और कविताओं की कॉकटेल पिलाकर पाठकों को बेसुध करने की क्षमता रखती है। पुस्तक लेखन की शारदा जी की यह विधापरक प्रयोग वाली कल्पना-वैभव की ऐसी स्वच्छन्द प्रवृत्ति, वास्तव में देश-कालगत वैशिष्ट्य के साथ ब्रह्माण्ड से परे दूसरी दुनिया के लोगों के रहस्यवाद की अभिव्यक्ति के साथ साथ विभिन्न उत्थानशील युगों की गाथाओं में वेद, पुराण, महाभारत, रामायण, नवरात्रि और दीपावली जैसे पर्वों के उल्लास तथा प्राचीन भारत की वैज्ञानिक व तकनीकी उपलब्धियों को एक ही मंच पर व्यक्त कर लेखिका के पाण्डित्य का हस्ताक्षर लगती है।

समाज और समय सिनेमा में प्रतिबिम्बित होता है। इस बात की पुष्टि हेतु सिनेमा के सौ सालों से अवगत कराते हुए सलमान खान से हुई मुलाक़ात की स्मृतियों को साझा करतीं शारदाजी जब मुज़फ़्फ़र की मीरा से पाठकों का साक्षात्कार करवाती हैं, तब कॉकटेल का स्वाद न जानने वाले भी उसकी आभिजात्य लोकप्रियता का कारण स्वतः ही समझ सकते हैं।

इस तरह समाज की यथार्थता से लेकर पारलौकिक आनंद की अनुभूति करवा देने वाली बहुत ही अच्छी पुस्तक है जिसमें विविध साहित्यिक विधाओं का रसास्वादन एक साथ मिलता है जो निःसंदेह इसकी विशेषता भी है। यह पुस्तक निश्चितरूप से अनिवार्यतया पठनीय है।


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