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ISSN 2292-9754

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08.25.2017


कुछ नहीं

जीवन थम सा गया है वक़्त की तरह,
वक़्त? ये तो रफ़्तार है,
जी हाँ
जीवन ऐसी ही रफ़्तार में है
बस साँसें चलती जा रही हैं,
अलसाये से
थके हुए
निरर्थक
एक तारतम्य में
बीतते ही जा रहे है,
जीवन के पल,
उत्साह
उमंग
साहस
सब दूर हो गए हैं,
एक ही धुन में सुइयों से चलते हुए
हर एक कि पसंद को
अपनी पसंद बनाने में,
रोज़ वही घर
उस घर को करीने से सजाने में,
सुबह की पूजा शाम की आरती
आज तक नहीं समझी
सवारी हूँ या सारथी,
और तुम कहते हो
कुछ करती ही नहीं,
सच तो ये है
करती तो हूँ बहुत कुछ
या शायद
सब कुछ,
मगर उसे मैंने नियति
और समाज ने कर्तव्य
समझ लिया है,
और
परिवार ने समझा
कुछ नहीं...


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