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ISSN 2292-9754

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08.25.2017


ग़लतफ़हमी

आज शाम से ही मौसम में कुछ सुहावनपन था, काले, सफ़ेद बदलों के अनेक तरह के चित्रों से आकाश भरा था। हर तरफ़ एक अजीब सी गंध थी, गंध या ख़ुशबू? शायद इसे लोग ख़ुशबू ही कहते हैं, मगर ये गंध मुझे किसी बीते समय में ले जाती है जब मुझे भी पसंद था इन फूलों की महक में खो जाना। मगर अब ये ख़ुशबू मेरे लिए मात्र एक गंध थी। कभी-कभी घुटन भी होती थी इनसे। इतना सोच ही रही थी कि आवाज़ आई, "आज पकौड़े हो जायें क्या?"

ये आवाज़ नमन की थी। मैंने सुनते ही कहा, "हाँ क्यों नहीं? आज नमन का मूड कुछ रूमानी है आज बात कर लेनी चाहिए यही सोच कर मैं पकोड़े बनाने की तैयारी में जुट गई। नमन भी मेरी छोटी-छोटी मदद कर रहे थे। मैंने सारे वाक्य मन में दुहरा लिए थे; क्या-क्या कहना है कहाँ से शुरू करना है।

मैंने कहना शुरू किया, "नमन ऑफ़िस में सब ठीक है?"

"हाँ वहाँ क्या होना है। रोज़ का वही है काम, काम, काम और बॉस की किचकिच।"

"अच्छा! अब तो तुम ऊपर के चैम्बर में हो न?"

"हाँ।"

"वहाँ कोई ख़ास दोस्त बना या सब वैसे ही हैं?"

"नहीं कोई नहीं।"

"अच्छा! "

कुछ देर की ख़ामोशी रही।

फिर मैंने ही कहा, "पकौड़ों के साथ चाय भी बना लूँ क्या?"

"अरे जान व्हाई नॉट यस प्लीज़!"

चाय नाश्ता सब मेज़ पर रखकर मैंने फिर एक बार नमन को देखा और कहा, "खा कर बताओ कैसे हैं?"

"तुम भी बैठो न, मुझे कुछ काम निपटाने हैं तुम खाओ।"

"ऐसे भी क्या काम , बाद में होंगे काम बैठो न।"

मैं बेमन सी बैठ तो गयी मगर वही सवाल बार बार मन में गुलाटियाँ ले रहा है। इतना ही सोचते हो तो क्या है ये सब क्यों है किसलिए है और कहते क्यों नहीं हो आख़िर संकोच कैसा। कई बार हमने लड़ाईयाँ की बोलचाल भी बंद रही मगर ऐसा ख़याल तो कभी नहीं आया मेरे मन में।

तभी तेज़ हवा के झोंके से खुली खिड़की ने मेरी सोच में ख़लल डाल दिया।

"अरे ये क्या चाय तो आपने ठंडी कर ली; मैं फिर गर्म कर देती हूँ।"

"नो डिअर इसकी ज़रूरत नहीं तुम नाश्ता करो ये मैं करता हूँ।"

नाश्ता ये नाश्ता मेरे प्रश्नों को नहीं मिटा सकता मुझे कहना ही होगा।

"नमन मुझे कुछ बात करनी है…"

"हाँ बोलो।"

"मैं तुम्हे तलाक़ देना चाहती हूँ।"

नमन मुस्कुराये, "आर यू जोकिंग? वैसे डराने का अच्छा तरीक़ा है।"

"नहीं ये सच है।"

नमन मेरे पास आकर बोले, "क्यों कोई और पसंद आ गया क्या?"

"नहीं मैं अकेले रहना चाहती हूँ अब।"

"मगर यहाँ कौन से हज़ारों हैं? मैं और तुम बस हम ही तो हैं। और वैसे भी संडे को छोड़ दें तो बाक़ी दिन तुम अकेली ही तो होती हो।"

"मगर मुझे अब नितांत अकेलापन चाहिए।"

"मगर क्यों? कोई वजह भी तो हो?"

"वजह है नमन…"

"वही तो मैं जानना चाहता हूँ। प्लीज़ टेल जान!"

"वजह है तुम्हारी अलमारी में रखे डिवोर्स पेपर।"

"व्हाट? तो ये बात है तुमने तो मेरी जान ही निकाल दी।"

"जान तो मेरी निकली थी इन्हें देखकर; अगर यही सब करना है तो इतना दिखावा क्यों? साफ़ कह दो।"

"मगर न कहना चाहता हूँ तो?"

"तो मैंने ये इल्ज़ाम भी हर बार की तरह अपने सिर लिया। तुम नहीं कह सकते मैं कहे देती हूँ।"

नमन मुस्कुराते हुए मेरे पास आये और बोले, "ये तो मैंने कभी सोचा ही नहीं।" मेरे हाथों को अपने हाथों में लेकर ऐसे पकड़ा की छोड़ना ही न चाहते हों मुझे। मैंने पूछा, "फिर ये सब क्या?"

तभी बदलों की गर्जना होने लगी। मुझे लगा नमन के होंठ हिले मगर मैं सुन नहीं पाई।

फिर नमन और क़रीब आकर बोले, "वो निम्मी दी बाहर हैं, उनके एक क्लाइंट ने रखने को दिए थे।"

"क्या?..." मैं आवक रह गयी। बाहर तेज़ बारिश शुरू हो गयी थी।

नमन बोले, "आज की बारिश में लगता है सारा शहर धुल जाएगा।"

मैंने धीरे से कहा, "…और मेरा मन भी।"

फिर हम दोनों मुस्कुरा दिए।


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