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ISSN 2292-9754

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08.10.2017


औरत बनायी जाती है...

इतना सरल नहीं है औरत पे कविता करना,
औरत जो पैदा नहीं होती
बल्कि बनायी जाती है,
बनाया जाता है उसके
अंगों को कोमल,
कुछ भी कोमल होता नहीं है लेकिन,
इमारतों के लिए ईंट उठाने में
जलते तवे पे रोटी बनाने में,

उनकी कोमलता को
कोई मोलता नहीं है।

बनाया जाता है उसे देवी
जिसका सीधा सा अर्थ
यही होता है कि
जो नहीं है सामान्य मनुष्य,
जिसके होने से घर स्वर्ग हो जाता है,
फिर भी उसका कोई
अपना घर नहीं होता।

देवी जो देहीर
बदले में न ले कुछ भी….

सचमुच सिर्फ़ एक ही दिन में
नहीं जाना जा सकता उसे,
जो ख़ुद ही ख़ुद को नहीं जानती,
औरत ख़ुद को कुछ भी नहीं मानती,
वो बाप के लिए बोझ,
पति के लिए दासी,
बच्चों के लिए
हर बात मनवाने का साधन
होती है,
ये सब बातें उसे बचपन से ही
सिखायी जाती हैं।

सच है औरत पैदा नहीं होती
बनायी जाती है…


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