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ISSN 2292-9754

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02.19.2016


एक पल को भी नहीं आराम है

एक पल को भी नहीं आराम है।
ग़ुरबतों में पलती सुबहो शाम है।

मौत के प्याले की दिल में आस रख
ज़िन्दगी तो एक कड़वा जाम है।

सबको अपने आप से मतलब है बस
अब कहाँ किसको किसी से काम है।

पूछते हैँ मुझसे कुछ यूँ बेज़मीर।
आपकी इज़्ज़त का कितना दाम है।

राम आशाराम अब बनने लगे
ना ही वो सीता और ना वो राम है।

छोड़कर तुझको नहीं जाऊँगा मैं
माँ तेरे कदमोँ मे चारों धाम है।

आइये वरना ज़हर पी जायेगें।
उनका ये 'शिव' के लिए पैग़ाम है।


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