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ISSN 2292-9754

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09.26.2017


सुनो बुलावा!

सुनो बुलावा!
क्या खाओगे!
घर में एक नहीं है दाना

सहनशीलता
घर से बाहर
गई हुई है
किसी काम से
राजनीति को
डर लगता है
किसी ‘अयोध्या’
‘राम-नाम’ से
चढ़ा चढ़ावा!
धरे पुजारी!
असफल हुआ वहाँ का जाना

आज़ादी के
उड़े परखचे
तड़प रही है
सड़क किनारे
लोकतंत्र का
फटा पजामा
पैबंदों के
पड़ा सहारे
लगा भुलावा!
वोटतंत्र यह!
मनमुटाव का एक घराना

मिला पलायन
माला लेकर
राजतन्त्र के
चित्रकूट पर
भूखमरी का
पेट छ्छ्नता
राजभवन के
घने रूट पर
बँधा कलावा!
जनसेवा का!
जाना केवल क्षितिज उठाना


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