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ISSN 2292-9754

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01.27.2018


सुख की रोटी

सुख की चोटी
दुख के परबत
से कुछ छोटी है
 
साँस रोकतीं
खुली हवायें
भूख सुनाती
असह कथायें
पड़ा हुआ है
लटका जीवन
महँगी रोटी है
 
छल-छंदों के
अपने नारे
करते हैं जो
वारे-न्यारे
चली उसी की
जिसके हाथों
दौलत मोटी है
 
मूक समर्थन
रोना रोता
समाधान का
शैशव सोता
लोकतंत्र भी
चुटकी काटा
फटी लँगोटी है


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