अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
01.27.2018


कोई साँझ अकेली होती

चौथेपन के वृन्दावन में
कोई साँझ अकेली होती
हरी दूब पर गीत टहलते
जिनिगी एक पहेली होती
 
धूप दूधिया गाँव समेटे
किसी रात से मिलने जाती
कोई अलका पथ पर मोती
अनजाने में ही बिखराती
बरगद की छैया के नीचे
शिवता एक सहेली होती
 
पगडंडी पर रोज़ गु्ज़रती
कोई बतियाहट बतियाती
खिली चाँदनी हँसती रहती
तारों सी चुनरी लहराती
विषम विषमतायें भी मिलतीं
खाली नहीं हथेली होती
 
कई अमावस मिलकर आतीं
और बतातीं नई कहानी
आँखों के आंगन में गिरता
सावन के बादल का पानी
शब्दों के पत्थर पर हँसती
कोई नई हवेली  होती


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें