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ISSN 2292-9754

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11.27.2018


कितने सूरज

कितने सूरज
उगे अकेले
जीवन के गलियारों में
 
सुबह टहलती सजी धूप में
पीछे छूटे कितने घर
बरगद की छाँवों में सिमटे
शारद दोपहरी के पर
दूर देश बनजारे निकले
रातों के अँधियारों में
 
दीपों ने लौ-लपट सजाकर
जलने की तैयारी की
अपनेपन ने अपनेपन से
हँस-हँसकर हुसियारी की
छिपी मिली है एक मित्रता
गोपनीय हथियारों में
 
नहीं पहुँचती सुभग हवायें
फसलों की हरियाली तक
राधायें भी आँख मींजतीं
मींच रहे वनमाली तक
गहन कालिमा बसी हुई है
उजली के उजियारों में

मींच रहे वनमाली तक
गहन कालिमा बसी हुई है
उजली के उजियारों में


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