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ISSN 2292-9754

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11.27.2018


कलियों का अनुप्रास

कसे-कसे ये हाथ लिखे हैं
रोटी का इतिहास
 
सूरज भी जब नहीं सुना हो
किरणों का अनुरोध
खुली हवाओं ने डाला हो
मनमाना अवरोध
चाहे मंगल दूर खड़ा हो
या हो चंदा पास
 
जब-जब चला भूख का ट्रैक्टर
हँसा एक मधुभार
सावन गये दिवाली आईं
मने कई त्योहार
कई वसंतों ने मुसकाया
मुसकाई हर प्यास
 
आशायें भी करवट बदलीं
मौसम के अनुसार
खलिहानों में आई सोने
फसलों की मनुहार
खिला-खिला दिखता है मधुवन
कलियों का अनुप्रास


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