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ISSN 2292-9754

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12.03.2015


कौन परिन्दें को आ के

कौन परिन्दें को आ के, आबो -दाना देता है।
शाख़े-शज़र पे रहने का, ठौर-ठिकाना देता है॥

बच्चों की अपनी मस्ती, गूँज रही गलियारे में,
कंचा-कंचा खेल रहा, कौन निशाना देता है?

इश्क़ हुआ तो महफ़िल सी, सारी दुनिया है सजती,
शम्मा जलती रहती है, संग परवाना देता है।

शोर-शराबा भारी है, आज अमीरे-बस्ती में,
आया कोई फ़कीर यहाँ, दर्द दिवाना देता है।

मैं बाबुल आँगन की गुड़िया, ढोती पीर परायी,
अम्मा का घर छूटा है, साथ घराना देता है।

किसने सच शिप्रा का समझा, बहती धीरे-धीरे,
आँख़ों-आँख़ों लहर समंदर ज़ख़्म ज़माना देता है।

आबो-दाना=दाना-पानी
शाख़े-शज़र=पेड़ की डाली


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