अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 

जब तलक़ आसमान बाक़ी है
शरद तैलंग


जब तलक़ आसमान बाक़ी है,
पंछियों की जु़बान बाक़ी है ।

अभी लंका ही ठीक है सीता,
क्योंकि इक इम्तहान बाक़ी है ।

द्रोपदी की कथा न भूल सका,
जिसका अब भी लगान बाक़ी है ।

शेर पेड़ों पे चढ़ नहीं पाए,
इसलिए ये मचान बाक़ी है ।

कैसे निर्दोष में कहूँ खु़द को,
अभी तेरा बयान बाक़ी है ।

गाँव लूटा ‘शरद’ रकीबों ने,
अब फ़कत दास्तान बाक़ी है ।

अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें