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ISSN 2292-9754

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02.27.2016


आप तो बस अपना ही ग़म देखते हैं

आप तो बस अपना ही ग़म देखते हैं,
किसलिए फिर मुझमें हमदम देखते हैं?

याद जब आते कभी बचपन के वो दिन
तब पुराने एलबम हम देखते हैं।

हमने खंज़र को भी दिल से है लगाया,
किस तरह निकलेगा अब दम देखते हैं

जो तकाज़े के लिए आते हैं घर में,
चिलमनों की ओर हरदम देखते हैं ।

क्या चुनावों की हवा चलने लगी है?
क़ातिलों के पास मरहम देखते हैं ।

महफ़िलों में जब से हम जाने लगे हैं,
लोग अब उनकी तरफ कम देखते हैं।

मौत पर उनकी “शरद” कोई न रोया,
पर झुका आधा ये परचम देखते हैं।


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