अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
10.15.2014


कश्ती बिना पतवार के चलती नहीं

कश्ती बिना पतवार के चलती नहीं
ये ज़िन्दगी भी यार बिन ढलती नही

रोशन न होता ग़र मुहब्बत से जिगर
तो आग सीने में कभी जलती नहीं

मिलती न तुमसे ये निगाहें ऐ ख़ुदा
हसरत तुम्हें पाने की तो पलती नहीं

ग़र साथ चलते तुम मेरे ही दो कदम
फिर ज़िन्दगी मुझको कभी खलती नहीं

मैं जानती ऐ काश तुमको बेवफ़ा
फिर ये मुहब्बत "शानू"को छलती नहीं 


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें