अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
06.22.2017


वो रोती नहीं अब

चाँद का इंतज़ार नहीं करती
खिड़की से सटी..
करवाचौथ के अलावा!
धूप में बाल सुखाना कब का छोड़ दिया
बरसात में नहाये उम्र बीत गई अब!
वो अब ख़ुद बिछी है
चाँदनी सी किसी के बिस्तर पर
दिन भर धूप सी उसके हाथों से उतर
बँधती रहती है
फ़ैक्टरी के सामानों में।
बारिश अब केवल सीने में होती है
और पसीने सी निकल बह जाती है
या फिर ठंडी साँसों सी बाहर निकल
गिनने लगती है पगार को..
जैसे रात गिनती है सितारे..
कितने भेजने हैं पिंड?
 ..कितने में चलेगा काम घर का?
जाने कितने..ख़र्चे…
उसके लंबे बालों से
उलझे ही रहते हैं!
और उम्र से गिरते चले जाते हैं साल
टूटते हुये तारों की तरह!
लोग कहते हैं
“ख़ुशकिस्मत है वो, विदेश में रहती है!”


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें