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ISSN 2292-9754

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06.07.2017


लाश एवं अन्य कहानियाँ (लेखक: सुमन कुमार घई)

समीक्ष्य पुस्तक: लाश व अन्य कहानियाँ (कहानी संग्रह)
लेखक: सुमन कुमार घई
समीक्षक: डॉ. शैलजा सक्सेना
प्रकाशक: पुस्तकबाज़ार.कॉम
(info@pustakbazar.com)
pustakbazaar.com
संस्करण: 2016 ई-पुस्तक
मूल्य: $3.00 (CDN)
पृष्ठ संख्या: 127
डाउनलोड लिंक: लाश व अन्य कहानियाँ

सुमन कुमार घई जी का यह पहला ई-कहानी-संग्रह है। उनकी कहानियाँ कई कहानी-संग्रहों तथा वेब पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। सुमन जी कहानीकार होने के साथ-साथ कवि और बहुत अच्छे संपादक भी हैं। पिछले अनेक वर्षों से वे साहित्यकुंज.नेट वेब पत्रिका का संपादन करके अच्छे लेखकों और अच्छा साहित्य पाठकों के सामने ला रहे हैं। उनके कवित्व भाव का इन कहानियों में विशेष योगदान नहीं है पर कह सकते हैं कि उनकी संपादकीय तीक्ष्ण दृष्टि और प्रखरता ने अनजाने ही उनकी कहानियों को माँजा और समेटा है इसलिये इन कहानियों में पहले कहानी-संग्रह होने का शुरुआतीपन नहीं दिखाई देता, ये एक सधे हुये लेखक की सुगठित कहानियाँ दिखाई देती हैं। एक अच्छी कहानी चरित्र या चरित्रों के, स्थिति के, समय के या भाव के द्वंद्व या संघर्ष को पिरोती है। सुमन जी की कहानियों में यह द्वंद्व बिना कुछ बोले हुये भी उपस्थित रहता है और कहानी के उतार-चढ़ाव से पाठकों को बाँधे रहता है। कनाडा के साहित्य लेखन में कविताई का ही ज़ोर अधिक रहा है, कहानी लिखीं भी गईं तो उनमें क़िस्सागोई अधिक थी, कहानी कम। टोरोंटो में हिन्दी की अच्छी कहानियाँ लिखने की शुरुआत अगर सुमन जी से मानें तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी।

सुमन जी का ज़ोर हमेशा अपनी ज़मीन से जुड कर कहानी लिखने पर रहा है। इस संग्रह में सात कहानियाँ हैं जिनमें से केवल दो कहानियाँ "थप्पड़" और "नन्दू का प्रेम रोग" भारतीय परिवेश से उपजी हैं, बाकी पाँच कहानियाँ उनकी ज़मीन यानी कनाडा के वातावरण से उपजी हुई कहानियाँ हैं। भारत से आये प्रवासियों के सामने परिवारिक स्तर और व्यक्तिगत स्तर पर यह चुनौती रहती है कि वे उन भारतीय तौर-तरीक़ों, रीति और त्यौहारों, जाति और संस्कृति को बनाये रखें जिन्हें उनके माता-पिता उनमें हमेशा देखना चाहते हैं। "विदेश जा कर विदेशी हो गया" का ताना और भय प्रवासियों पर प्राय: इस तरह छाये रहते हैं कि वे स्वयं भी न तो स्वस्थ रूप से समय के साथ चलते हैं और न ही अपने बच्चों को चलने देते हैं। यह प्रवासियों के जीवन की ऐसी सच्चाई है जिसे गहराई से समझने की ज़रूरत है। "लाश और अन्य कहानियाँ" की पहली कहानी "असली-नकली" इस समस्या से जूझती है।

"असली-नकली" कहानी एक लेखक के कथानक ढूँढ़ने से होती है। लेखक ने कहानी प्रथम-पुरुष शैली में लिखी है, कहानी हल्के आत्म-व्यंग्यात्मक "मूड" से शुरू होती है जहाँ लेखक एक रेस्टोरेंट में कॉफी पीने और अपनी कहानी के लिये विचार/ आइडिया ढूँढने जाता है। रेस्टोरेंट के वातावरण का बहुत सुन्दर वर्णन किया गया है। कहानी दो प्रेमियों की आपसी बातचीत से शुरू होती है जिसे लेखक सुन रहा है। लगता है जैसे यह एक आम प्रेमी-प्रेमिका के रूठने-मनाने, लड़के के नौकरी न करने और लड़की के माता-पिता की नौकरीहीन लड़के से शादी न करवाने की ज़िद्द की कहानी है पर अनायास ये दोनों अपने न मिल पाने के कारणों पर बात करते हुये अपने माता-पिता के दोहरे आचरण की चर्चा करने लगते हैं। भारतीय प्रवासियों की पहली पीढ़ी की दूसरी पीढ़ी के साथ होने वाली टकराहट कहानी के केन्द्र में आ जाती है। कहानी में लेखक ने दो पीढ़ियों का विश्लेषण पहले पात्रों के मुँह से कहलवाया है, बाद में स्वयं करते हुये विचारा है कि इन पीढ़ियों में से कौन असली है और कौन नकली है? एक स्थिति में उनका पात्र कहता है, "हाँ सब बिन पैंदे के लोटे की तरह ही तो हैं। किसी ठोस मूल के साथ कहीं बँधे नहीं हैं। वह तो ऐसे पेड़ की तरह हैं जिसकी जड़ ही नहीं है, हल्का धक्का लगा कि गिर जायेंगे।" अंत में लेखक कहता है कि प्रवासी विदेश में आकर स्वयं तो चाहें उन्मुक्त आचरण कर लें परन्तु अपने बच्चों को पुरानी संस्कृति से बाँधे रखना चाहता है। उन्मुक्तता का आकर्षण और नयी पीढ़ी के अपनी संस्कृति से भटक न जाने की चिन्ता के बीच भिन्न आचरणों को दिखाते हुये कहानी समाप्त होती है। इस के अतिरिक्त पुरानी मान्यताओं जैसे नौकरी करने वाले लड़के से शादी करना, प्रेम-विवाह के स्थान पर माता-पिता द्वारा तय किया गया विवाह करना आदि बिंदुओं पर भी कहानी दृष्टि डालती चलती है। कहानी का वर्णन उत्सुकता लिये हुये है। लेखक के साथ-साथ पाठक भी प्रारंभ से ही उत्सुक हो जाता है कि इस रेस्टोरेंट से कौन सी कहानी निकल कर आने वाली है। कहानी पीढ़ियों की टकराहट के मूल कारणों की जाँच नहीं करती पर इन टकराहटों के असली-नकलीपन पर से पर्दा हटाने की चेष्टा करती है और सफल होती है।

इस संग्रह की दूसरी कहानी "उसकी ख़ुश्बू" है। यह कहानी भी विदेश के परिवेश पर आधारित कहानी है। पिछली कहानी में स्वतंत्रता न मिलने की शिकायत करते हुए प्रेमी-प्रेमिका थे तो इस कहानी में शादी करके आयी हुई भारत की एक आधुनिक लड़की है जो विदेश में रहने वाले भारतीय से शादी करती है, नये स्थान को अपना बनाने की सारी प्रक्रिया से सहजता से गुज़रती है, नौकरी करती है और नये जीवन और घर को अपना बना लेती है। अपने बेटे और पति से उसकी उतनी ही अपेक्षायें हैं जितनी स्वयं से परन्तु उसे अपनी स्वतंत्रता बहुत प्रिय है। उसे अपनी मित्र जैनी का जीवन इतना अच्छा लगता है कि वह स्वयं भी वैसे ही जीना चाहती है। जैनी तलाक़ के बाद अपने प्रेमी के साथ रहती है और उस पर बच्चों या किसी अन्य की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। विनय, कहानी का नायक अपनी पत्नी को पूरी छूट देता है पर समझाता भी है कि हमारा जीवन यहाँ के लोगों से भिन्न है पर मीरा, उसकी पत्नी नाराज़ होकर उसके जीवन से चली जाती है. उनके बेटे तरुण ने माँ के स्थान पर पिता के साथ रहना ठीक समझा। कहानी का प्रारंभ विनय के घर आने और वातावरण में मीरा के परफ्य़ूम को सूँघने से होता है। कहानी स्मृति के माध्यम से आगे बढ़ती है। अंत में विनय को पता लगता है कि पति-पुत्र से स्वतंत्रता चाहने वाली मीरा कभी-कभार पुत्र से मिलती है और उसके लिये खाना बना कर भी लाती है। पिता-पुत्र यह भी चर्चा करते हैं कि बहानों–बहानों से वे हर दिन मीरा को याद कर ही लेते हैं। विनय बेटे से कहता है कि "एक मैं ही पराया हो गया"। यह एक वाक्य तलाक़शुदा पुरुष के मानसिक कष्ट को गहराई से व्यक्त करता है। कहानी के अंत में विनय तरुण से कहता है, "उसको कहना आती रहा करे"। कहानी की बुनावट में कोई पेंच नहीं पर जिस मुद्दे को वह उठाती है उसमें आधुनिकता के नाम पर सामान्यता से भागना, स्वतंत्रता के नाम पर ज़िम्मेदारी से भागने की (साइकी) मनोवृत्ति का पेंच है। मीरा कुछ देर परिवार में ख़ुश रही पर जैनी जैसी स्वतंत्रता को तरसने के कारण उसने स्वयं को और शेष परिवार को दुखी कर दिया और अंत में स्वतंत्र हो कर भी अपने ममत्व से स्वतंत्र नहीं हो पाई। यह सुमन जी की कहानियों की विशेषता है कि वे बड़े मुद्दों को अपनी बुनावट में इतनी सरलता से बुनती हैं कि वे स्थितियाँ त्रासद हो कर भी बोझिल नहीं बनतीं। कहानी का अंत इतने मानवीय तरीक़े से होता है कि उनकी सहजता पर अचरज होता है। विनय को मीरा का आना अपने अहम, प्रतिष्ठा पर चोट नहीं लगता, उसमें कड़वाहट नहीं जागती, बल्कि मीरा की ख़ुश्बू का अहसास उसे अच्छा लगता है और वह उसे दोबारा घर में आने के लिये निमंत्रित करता है। इन स्थितियों में किसी पति से इस प्रतिक्रिया की आशा नहीं की जा सकती परन्तु विनय का सहजता से मीरा को दोबारा आने के लिये कहना भी अजीब या असत्य नहीं लगता। यह सहजता ही कहानीकार की विशेषता है जो उसे अन्य कहानीकारों से अलग करती है।

तीसरी कहानी "थप्पड़" भारत के एक क़स्बे के एक अहातेदार की कहानी है जो नशे में अपनी पत्नी को पीटता है और औरत को क़ाबू में कर के रखने की मानसिकता का व्यक्ति है। एक रात नशे की हालत में वह सबके सामने अपनी पत्नी की साड़ी खींच लेता है। उसकी पत्नी सबके सामने शर्मिन्दा होती रहती है पर उसकी मदद को कोई नहीं आता, पत्नी भी उसे चुनौती देती है कि वह भी उसे सबके सामने ऐसे ही नंगा करेगी। अहाते की एक वृद्ध महिला उसी अहाते में रहने वाले एक कुँआरे युवा और उस स्त्री के बीच प्रेम करवा देती है और अंत में वे दोनों अहाता छोड़ के चले जाते हैं, मलिक ठेकेदार की स्थिति वही होती है जो उसकी पत्नी ने चुनौती के तौर पर कही थी। कहानी का कथानक पुरुष क्रूरता को रेखांकित करता है और स्त्री के साहस को विजयी बनाता है। चुप रहने वाली स्त्री अत्याचार सहते-सहते इतनी कड़ी हो जाती है कि गालियाँ देती है और अन्य युवक का सहारा मिलने से घर छोड़ने जैसा बड़ा क़दम उठा लेती है। अत्याचार सहने वाला कब खड़ा हो जाये, कहा नहीं जा सकता पर वो खड़ा होगा अवश्य, यह बात कहानी से स्पष्ट होती है। कहानी रोचक और प्रवाहपूर्ण है।

अगली कहानी "नंदू का प्रेमरोग’ एक हल्की-फुल्की कहानी है जिसे हास्य-कहानी भी कहा जा सकता है। यह कहानी विद्यार्थी नंदू को छत पर बाल सुखाती लड़की से हुये प्रेम की कहानी है जो अंत में उसकी अध्यापिका निकलती है। नंदू का प्रेम प्रसंग करने के लिये उतावलापन, लड़की को देखने के लिये छत पर खड़े रहना, लड़की से बात करने के लिये बहानों से उसके घर के आस पास चक्कर लगाना आदि वर्णन बहुत रोचक तरह से प्रस्तुत किये गये हैं। फ़िल्मों के प्रेम को जीवन का आधार मान कर चलने वाला नंदू अंत में अपने से उम्र में बड़ी अध्यापिका से प्रेम करने की संभावना "मेरा नाम जोकर" फ़िल्म से पाता है और प्रसन्न हो जाता है। कहानी नंदू की प्रेम कथा से ज़्यादा, उसके प्रेम में पड़ने की चेष्टाओं और उस प्रक्रिया की है। कहानी कहने की शैली बहुत रोचक है और पाठक नंदू की हरकतों पर बरबस ही मुस्कुरा उठता है।

"लाश" कहानी का कथानक मन को झकझोरने वाला कथानक है। कहानी कनाडा के सामान्य से मौहल्ले से शुरू होती है जहाँ भारतीय और पाकिस्तानी परिवारों की तीन पीढ़ियाँ एक संतुलन के साथ रह रही हैं। लेखक लिखता है, तीनों के अपने-अपने वृत हैं। यह समाज एक संतुलित समाज लगता है जिसमें सड़क पर पड़ी लाश हलचल ले आती है। रंगे बाल और जीन्स को देख कर औरतें उसे विदेशी आवारा ब्लाँड बताने लगती हैं पर उसे भारतीय जान कर हैरान होती हैं। "हमारा समाज अच्छा और उनका खराब" की मानसिकता वाले बुज़ुर्गों को जब उस लड़की की कहानी पता चलती है तो जैसे इस मानसिकता की सींवन उधड़ जाती है। जो नग्न सत्य सामने आता है वह चौंकाने वाला और अनेक प्रश्न उठाने वाला है। इस कहानी में भारतीय माँ-बाप के अतिरिक्त कड़े शासन में पली-बढ़ी यह लड़की, उस लड़के से ब्याह दी जाती है जो उन्हीं का दूर का रिश्तेदार था और शरणार्थी होकर भारत से आया था। वह उन के साथ ही रहता था, माता-पिता ने उस लड़के को लड़की के सामने भाई के रूप में प्रस्तुत किया जिसे वह राखी भी बाँधती थी। नागरिकता की समस्या के चलते माँ-बाप ज़बरदस्ती उसकी शादी उसी लड़के से कर देते हैं। लड़की यह संबंध स्वीकार नहीं कर पाती और घुटने लगती है। कुछ समय बाद उसके एक बेटा होता है पर बेटे को भी वह पाप की औलाद समझती है। इसी मानसिकता में जीते हुये वह पागल हो जाती है। कुछ समय पागलखाने में रह कर आने के बाद भी उसकी मानसिक स्थिति नहीं बदलती। वह बेटे को मारती, गालियाँ देती और बार-बार घर से भाग जाती है। आख़िर में उसे बिना बताये माँ-बाप ने घर बदल लिया और उस लड़के की दूसरी शादी करा दी। अब यह लड़की और अधिक बौखला जाती है और स्कूलों में अपने बच्चे को ढूँढ़ती है, इस बीच नशे की आदत भी लग जाती है। उसके जीवन की भटकन का अंत सड़क पर पड़ी लाश के रूप में होता है। यह कहानी बहुत मार्मिक है और नायिका के माता-पिता द्वारा नैतिकता को अपने अनुसार तोड़े-मरोड़े जाने और उसके विनाशकारी प्रभाव को दिखाती है। जो माता-पिता लड़की को बहुत कड़ाई से पाल रहे थे कि कहीं वह अपनी सभ्यता भूल कर विदेशी सभ्यता में न रम जाये, उन्होंने ही सारे मूल्यों को ताक पर रख कर, राखी-बंद भाई से उसका विवाह करवा दिया। यह तथ्य बहुत से लोगों को अविश्वसनीय लग सकता है पर ऐसे अनेक क़िस्से कनाडा में हुये हैं जहाँ सगे भाई-बहन ने काग़ज़ पर शादी कर के वीसा प्राप्त करना चाहा है तो ऐसे में इस कहानी के माता-पिता का स्वार्थ कि लड़की और जमाई घर ही पर रहेंगे, उनसे ऐसा अनैतिक काम करवा ले तो हैरानी की बात नहीं। कहानी भारतीय मूल्यों पर गर्व कर के विदेशी सभ्यता को बुरा कहने वाले लोगों पर बहुत कड़ा प्रहार करती है। अपनी लड़की के बुरे दिनों में मदद न करके, समाज में बदनामी के डर से उसे लावारिस की तरह अकेला छोड़ देने वाले माता-पिता की मानसिकता का जबाब शर्मा जी देते हैं जब वे पुलिस को यह बताने को तैयार होते हैं कि यह लड़की लावारिस नहीं, उन सब की बेटी है। कहानी में अनेक जगह ऐसी स्थितियाँ और संवाद हैं जो दिखाते हैं कि भारतीय लोग विदेशी व्यवस्था का तो गुणगान करते हैं परन्तु विदेशी परिवारों की स्वतंत्रता और व्यवहार को अपने से हेय मानते हैं। यह सुविधाभोगी, सतही मानसिकता है जो "सामान्यीकरण" (जनरलाइज़ेशन) से काम चला कर अपने आस-पास को समझना नहीं चाहती। कहानी की भाषा स्थिति और पात्रों के अनुसार और प्रवाहपूर्ण है और कहानी को प्रभावपूर्ण बनाता है।

"सुबह साढ़े सात से पहले" कहानी को हिन्दी की अच्छी कहानियों में नि:संकोच गिना जा सकता है। प्रसिद्ध कहानीकार तेजेन्द्र शर्मा ने इसे हिन्दी की "बेहतरीन कहानियों में से एक" कहा है। यह कैनेडा की पृष्ठभूमि पर एक भारतीय परिवार के जीवन को दिखाते हुये सन १९६० की मानसिकता के सामने १९९० की मानसिकता और परिस्थितियों को खड़ा करती है और बदलती स्थितियों में पति-पत्नी की चुपचाप बदल गई भूमिकाओं को दिखाती है। १९९० में उत्तरी अमरीका में आयी आर्थिक मंदी (रिसेशन) के कारण आई-टी. क्षेत्र में जिन लोगों की नौकरियाँ छूट गईं थीं, उन्हें नौकरी दोबारा मिलने में बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ा, बहुत से लोगों को तो दोबारा नौकरी मिली ही नहीं। कहानी का नायक राजीव उन्हीं लोगों में से एक है जिसका जीवन सामान्य रूप से चलते-चलते नौकरी छूट जाने के कारण एकदम रुक गया। नौकरियों के आवेदन दे-देकर जब वह थक गया तो उसकी पत्नी ने एक समाधान निकाला कि राजीव घर सँभाले और वह यानी मीना नौकरी करे। मीना के पिता उसे "पुरुष होकर घर बैठे पत्नी की कमाई खाने" के ताने और बच्चे न होने का उलाहना देते हैं जिनसे मीना तो उत्तेजित होती है पर राजीव नहीं। वह जानता है कि "पापा जी" सन् ६० की उस पुरानी स्त्री पर बच्चों का बंधन लगा कर शासन करने वाली मानसिकता के व्यक्ति हैं। इधर राजीव जो स्वयं तो पिता बनना चाहता था, वह मीना की बच्चे न करने की इच्छा का आदर करता है, वह जितनी सहजता और कुशलतापूर्वक घर सँभाल लेता है, पत्नी के ऑफिस के कपड़ों से लेकर शेष सब कामों को बिना किसी पूर्वाग्रह के करता है, वह सराहनीय है। यह आवश्यकता के अनुसार संबंधों की बदलती भूमिकाओं की कहानी तो है ही साथ ही राजीव के माध्यम से पूर्वाग्रह-मुक्त पति की अच्छी तस्वीर भी दिखाती है। हर स्त्री ऐसा सहज, शांत और प्रेम करने वाला पति चाहती है और यह कहानी दिखाती है कि स्त्री-पुरुष यदि पूर्वाग्रह-मुक्त हों तो जीवन की यह सहजता और सरलता संभव है। इस कहानी की विशेषता यह है कि मुख्य पात्रों में कोई द्वंद्व नहीं है पर परिस्थिति और पुरानी मान्यताओं को पृष्ठभूमि में रख कर लेखक द्वंद्वात्मक वातावरण और सहज बदलाव दोनों को दिखाता है। यह कहानी लोगों द्वारा बहुत पसंद की गई है।

इस कहानी संग्रह की अंतिम कहानी है "उसने सच कहा था"। यह कहानी एक ऐसे भारतीय की है जो अपनी बेटियों के साथ भारत से अच्छे जीवन की तलाश में कैनेडा आता है और एक पिछड़े इलाक़े में कम दामों पर एक कॉर्नर-स्टोर ख़रीद लेता है। यह इलाक़ा रात को छोटी-बड़ी लड़कियों के अपने को बेचने, रुकती-बढ़ती कारों में बैठे ख़रीददारों का इलाक़ा है। यहाँ झूठ और धोखा बिकता है इसलिये इन सब के बीच स्टोर चलाता यह व्यक्ति सब देख कर भी भावनात्मक स्तर पर इन सब से अछूता रहने की चेष्टा करता है। कहानी प्रथम पुरुष में लिखी गई है। सर्दियों की एक ठंडी रात जब जैनी ग्राहक न मिलने पर उसे ही पैसों के लिये लुभाने की कोशिश करती है तो वह उसे यह कहते हुये स्टोर से बाहर निकाल देता है कि वह उसकी बाप की उम्र का है। जैनी दुखी भाव से हँसती है कि "उसे तो उसके बाप ने भी नहीं छोड़ा.." बाद में जैनी की कहानी को सुनने के बाद भी उसे विश्वास नहीं होता कि दस वर्ष की उम्र में उसके अपने पिता ने उसका दैहिक शोषण किया होगा। जैनी बताती है कि उसकी माँ बोतल और गोलियों के नशे में रहती थी और पिता के किये शोषण पर विश्वास नहीं करना चाहती थी। स्टोर-मालिक भी उसकी बात पर विश्वास नहीं कर पाता और उसे झूठ की दुनिया का एक और झूठ ही मानता है। एक दिन जैनी अपनी छोटी बहनों को स्टोर लाकर आइसक्रीम खिलवाती है और बहुत प्रसन्न होती है पर थोड़ी ही देर में यह जान कर कि उनकी माँ ने उसे लेने भेजा है, चिल्लाने लगती है, "नहीं लौटूँगी घर, कह देना उस बुढ़िया से बात-बात में मुझॆ गश्ती कहती थी, अब बन गई हूँ मैं गश्ती। हो जाये खुश। मैं नहीं लौटूँगी।" लेकिन उसके बाद अपनी बहनों को अपने पिता की ग़लत निगाहों और कामों से बचाने की चिंता करते हुए वह घर लौट जाती है। तब स्टोर-मालिक को लगता है कि जैनी ने "सच ही कहा था"। कहानी अपने को बेचने वाली लड़कियों की मजबूरी की कहानी है। ऐसी बहुत सी कहानियाँ हिन्दी साहित्य में पढ़ने को मिलती हैं पर यह कहानी उन अनेक कहानियों से इसलिये अलग लगती है क्योंकि कहानी की पूरी बुनावट और प्रवाह में लेखक बहुत तटस्थ रहता है और कहानी बहुत "मैटर ऑफ फ़ैक्ट" यानी केवल यथार्थ वर्णन द्वारा ही आगे बढ़ती है इसीलिये जैनी का सच जब उसे झूठे वातावरण में उभरता भी है तो वह उसे झूठ ही मानता है। प्राय: जो हिन्दी कहानियाँ इस विषय को लेकर लिखी गईं हैं उसमें लेखक की सहानुभूति पहले से ही उन लड़कियों के प्रति होती है और वे उन सामाजिक स्थितियों को बताते हैं जिनकी शिकार ये लड़कियाँ हुई होती हैं। इस कहानी में उल्टा हो रहा है, यहाँ कहानीकार अपनी सहानुभूति को बचा कर इन लड़कियों की बात करता है। यही यथार्थ वर्णन इस कहानी को नयापन देता है। यह भी दिखाई देता है कि भारत हो या कनाडा, दैहिक शोषण की शिकार लड़कियाँ घर के लोगों से ही छली जाती हैं। कहानी में बदलते मौसमों, "इलाक़े के व्यक्तित्व" का बहुत सजीव वर्णन है जो कहानी को छाया-चित्र सी रोचकता देता है।

इस कहानी-संग्रह की अधिकांश कहानियाँ कनाडा की ज़मीन पर रहने वाले भारतीयों की, उनके बदलते मूल्यों, मानसिक स्तर पर दो संस्कृतियों के टकराव और तनाव को दिखाती हैं। यह तनाव बहुत कुछ अपने को बेहतर मान कर विदेशी संस्कृति को उसकी तुलना में हेय मानने के भाव से उपजा है। यह सुमन जी की लेखनी की विशेषता है कि उन्होंने इस तनाव और संघर्ष को कहानी की सतह पर नहीं, उसे पृष्ठभूमि में गहरे बुना है और उस के आधार पर पात्रों के विभिन्न व्यवहार और सोच को प्रस्तुत किया है। एक अन्य विशेषता जो इन कहानियों की है, वह है, पुरुष पात्रों का बदला हुआ रूप। जैसे विभिन्न स्थितियों में स्त्री और पुरुष की भूमिकायें समाज में तय हो चुकीं हैं, उसी तरह से लेखन में भी प्राय: तय हैं, उनकी क्रिया, प्रतिक्रिया यहाँ तक कि उनमें आये बदलाव तक जिन प्रक्रियाओं से होकर आते हैं वे सब साहित्य में अनेक बार दोहराये गये है ऐसे में कहानीकार या तो वातावरण के माध्यम से या कथानक के द्वारा नयापन पैदा करता है। सुमन जी की कहानियों में शेष कहानियों से जो अंतर दिखाई देता है वह यह है कि प्राय: उनके पात्र "प्रेडिक्टिबल"- घोषित या अपेक्षित व्यवहार नहीं करते। उनका व्यवहार किसी दबाब के कारण भी बदला नहीं दिखाई देता। ये पात्र जैसे, "सुबह साढ़े सात से पहले" का राजीव, "उसकी ख़ुश्बू" का विनय, "उसने सच कहा था" का "मैं", अपनी सहजता और सरलता में ही बदले हुये व्यवहार करते हैं। उनके व्यक्तित्व की सरलता कहानी में द्वंद्व आदि को प्रस्तुत करते हुए भी कहानी को त्रासद और बोझिल नहीं बनाती, पाठक में सामाजिक स्थितियों की निराशा नहीं भरती लेकिन ध्यान देने की बात है कि वह आशा को भी नारे या भाषण की तरह प्रस्तुत नहीं करती। यह आशा पात्रों के सहज चरित्रों से ख़ुश्बू की तरह अनदेखॆ तौर पर निकलती है और पाठक के मन को ख़ुशी की तरह प्रभावित करती है। इस तरह कहानियों में छोटे संवादों में बड़ी बात प्रस्तुत की गई है और हर कहानी का अंत सुखद लगता है। यहाँ तक कि "लाश" जैसी त्रासद कहानी अंत में उस लड़की का अंत बदल देती है जब शर्मा जी एक वाक्य में उसे लावारिस से "हमारी बेटी" का संबंध दे देते हैं। "थप्पड़" में मालती का दुखद स्थितियों से निकलना, पति को छोड़ कर जाने जैसा साहसिक क़दम उठाना और यहाँ तक कि "नंदू का प्रेमरोग" में नंदू का बड़ी उम्र की अध्यापिका से प्रेम संबंध की संभावना से ख़ुश होना- सभी कहानियों को सकारात्मक अंत देते हैं।

सुमन जी को अपने पहले कहानी-संग्रह के प्रकाशन पर बहुत-बहुत बधाई। सब ओर से दबाब पड़ने पर सुमन जी ने बहुत लंबे समय के बाद यह कहानी संग्रह प्रकाशित किया है, आशा है उनके पाठकों को उनके दूसरे कहानी-संग्रह के लिये लंबा इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा। उन्हें इस संग्रह की लोकप्रियता के लिए समस्त शुभकामनायें!!


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