अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.21.2016


मरुभूमि के कठिन संघर्षों की दास्तान "शौर्य पथ"

पुस्तक : शौर्य पथ
लेखक : आईदान सिंह भाटी
प्रकाशन : रॉयल पब्लिकेशन, जोधपुर
मूल्य : 300 रुपये

आदिकाल और मध्यकाल का इतिहास राजा रजवाड़ों और सामंतों का इतिहास रहा है। दरअसल यह इतिहास कम अतिरंजित वीरगाथाएँ ही अधिक होती हैं। इन वीर गाथाओं में शौर्य, भक्ति और श्रृंगार का अद्भुत मिश्रण होता है। जनता यहाँ बहुत ही उपेक्षित एवं दीनहीन स्थिति में रही। उसके संघर्षों, जीवट और कर्म इतिहास नहीं बने। मैंने पूर्व में वृंदावन लाल वर्मा और चतुरसेन शास्त्री के कुछ ऐतिहासिक उपन्यास पढ़े हैं जिनमें इतिहास और कल्पना से कथा का ताना बाना बुना गया था। कुछ उपन्यासों में गौरवगाथा के अतिरिक्त मिथक, परंपराएँ, रहस्यवाद और चमत्कारों को प्रधानता दी गई। इस परंपरा की शुरुआत सबसे पहले किशोरीलाल गोस्वामी ने की। आगे चलकर वृन्दानलाल वर्मा, भगवतीचरण वर्मा, जयशंकर प्रसाद, राहुल सांकृत्यायन, रांगेय राघव, यशपाल, हज़ारीप्रसाद द्विवेदी, चतुरसेन शास्त्री, अमृतलाल नागर, नरेन्द्र कोहली आदि रचनाकारों ने इस विधा को अधिक सशक्त और लचीला बनाया। दुर्गादास महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद का ऐतिहासिक उपन्यास है जो मुख्यत: उर्दू लिपि में लिखा गया और जिसका हिन्दी अनुवाद पहली बार सन् 1915 में प्रकाशित हुआ था। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार राजा यशवन्तसिंह के सेवक दुर्गादास ने उसकी मृत्यु के बाद राजा के पुत्र अजीतसिंह को औरंगज़ेब तथा उसके मुग़ल सेना से सुरक्षित किया तथा औरंगज़ेब को मारवाड़ से भगाकर अजीतसिंह को राज सौंपा। तथा किस प्रकार उसे दुष्ट अजीतसिंह से दूर भागना पड़ा। इसमें एक वीर की संघर्षपूर्ण गाथा है जो अपने मातृभूमि के लिये अपना सर कटवाने तक को तैयार था। स्वयं प्रेमचंद उनका बखान करते हैं। प्रेमचंद के शब्दों में – "राजपूताना में बड़े-बड़े शूर-वीर हो गये हैं। उस मरुभूमि ने कितने ही नर-रत्नों को जन्म दिया है; पर वीर दुर्गादास अपने अनुपम आत्म-त्याग, अपनी निःस्वार्थ सेवा-भक्ति और अपने उज्जवल चरित्र के लिए कोहनूर के समान हैं। औरों में शौर्य के साथ कहीं-कहीं हिंसा और द्वेष का भाव भी पाया जाएगा, कीर्ति का मोह भी होगा, अभिमान भी होगा; पर दुर्गादास शूर होकर भी साधु पुरुष थे।" इसमें प्रेमचंद ने अपनी रचनाशीलता का परिचय देते हुए महत्वपूर्ण तथ्य समाहित किये हैं।

इधर राजस्थानी के सुप्रसिद्ध कवि आईदान सिंह भाटी का एक उपन्यास आया है "शौर्य पथ"। अब राजपूताने के राजाओं पर यदि कोई उपन्यास लिखा जायेगा तो वह उनकी अतिरंजित गाथाओं से परिपूर्ण अवश्य होगा। परन्तु आईदान सिंह भाटी ने इसे यथासंभव लचीला और साहित्यिक बनाने की कोशिश की है। जैसलमेर राज्य की स्थापना भारतीय इतिहास के मध्यकाल के प्रारंभ में 1178 ई. के लगभग यदुवंशी भाटी के वंशज रावल जैसल के द्वारा की गयी। भाटी मूलत: इस प्रदेश के निवासी नहीं थे। यह अपनी जाति की उत्पत्ति मथुरा व द्वारिका के यदुवंशी इतिहास पुरुष कृष्ण से मानते थे। कृष्ण के उपरांत द्वारिका के जलमग्न होने के कारण कुछ बचे हुए यदु लोग जाबुलिस्तान, ग़ज़नी, काबुल व लाहौर के आस-पास के क्षेत्रों में फैल गए। वहाँ इन्होंने बाहुबल से अच्छी ख्याति अर्जित की, परंतु मध्य एशिया से आने वाले तुर्क आक्रमणकारियों के सामने ये ज़्यादा नहीं टिक सके। और लाहौर होते हुए पंजाब की ओर अग्रसर होते हुए भटनेर नामक स्थान पर अपना राज्य स्थापित किया। उस समय इस भू-भाग पर स्थानीय जातियों का प्रभाव था। अत: ये भटनेर से पुन: सिंध मुल्तान की ओर बढ़े। अन्तोगत्वा मुमणवाह, मारोठ, तपोट, देरावर आदि स्थानों पर अपने मुकाम करते हुए थार के रेगिस्तान स्थित परमारों के क्षेत्र में लोद्रवा नामक शहर के शासक को पराजित कर यहाँ अपनी राजधानी स्थापित की। इस भू-भाग में स्थित स्थानीय जातियों जिनमें परमार, बराह, लंगा, भूटा, तथा सोलंकी आदि प्रमुख थे। इनसे सतत संघर्ष के उपरांत भाटी इस भू-भाग को अपने आधीन कर सके। वस्तुत: भाटियों के इतिहास का यह संपूर्ण काल सत्ता के लिए संघर्ष का काल नहीं था वरन अस्तित्व को बनाए रखने के लिए भी संघर्ष था, जिसमें वे सफल रहे। सन 1175 ई. के लगभग मोहम्मद गौरी के निचले सिंध व उससे लगे हुए लोद्रवा पर आक्रमण के कारण इसका पतन हो गया और राजसत्ता रावल जैसल के हाथ में आ गई जिसने शीघ्र ही उचित स्थान देख कर सन् 1178 ई. के लगभग त्रिकूट नाम की पहाड़ी पर अपनी नई राजधानी की स्थापना की जो उसके नाम से जैसल-मेरु - जैसलमेर कहलाई गयी। इस जैसल मेरु को आईदान सिंह जैसलगिरा कहते हैं। सन 1308 के लगभग दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी की शाही सेना द्वारा यहाँ आक्रमण किया गया व राज्य की सीमाओं में प्रवेशकर दुर्ग के चारों ओर घेरा डाल दिया। यहाँ के राजपूतों ने पारंपरिक ढंग से युद्ध लड़ा। जिसके फलस्वरूप दुर्ग में एकत्र सामग्री के आधार पर यह घेरा लगभग 6 वर्षों तक रहा। इसी घेरे की अवधि में रावल जैतसिंह का देहांत हो गया तथा उसका ज्येष्ठ पुत्र मूलराज जैसलमेर के सिंहासन पर बैठा। मूलराज के छोटे भाई रत्नसिंह ने युद्ध की बागडोर अपने हाथ में लेकर अन्तत: खाद्य सामग्री को समाप्त होते देख युद्ध करने का निर्णय लिया। दुर्ग में स्थित समस्त स्त्रियों द्वारा रात्रि को अग्नि प्रज्वलित कर अपने सतीत्व की रक्षा हेतु जौहर कर लिया। प्रात: काल में समस्त पुरुष दुर्ग के द्वार खोलकर शत्रु सेना पर टूट पड़े। जैसा कि स्पष्ट था कि दीर्घकालीन घेरे के कारण रसद व युद्ध सामग्री विहीन दुर्बल थोड़े से योद्धा, शाही फ़ौज जिसकी संख्या काफ़ी अधिक थी तथा ताज़ा दम तथा हर प्रकार के रसद तथा सामग्री से युक्त थी, के सामने अधिक समय तक नहीं टिक सके शीघ्र ही सभी वीरगति को प्राप्त हो गए। सल्तनत काल में द्वितीय आक्रमण मुहम्मद बिन तुग़लक़ (1325-1351 ई.) के शासन काल में हुआ था, इस समय यहाँ का शासक रावल दूदा (1319-1331 ई.) था, जो स्वयं विकट योद्धा था तथा जिसके मन में पूर्व युद्ध में जैसलमेर से दूर होने के कारण वीरगति न पाने का दु:ख था, वह भी मूलराज तथा रत्नसिंह की तरह अपनी कीर्ति को अमर बनाना चाहता था। फलस्वरूप उसकी सैनिक टुकड़ियों ने शाही सैनिक ठिकानों पर छुटपुट लूटमार करना प्रारंभ कर दिया था। इन सभी कारणों से दण्ड देने के लिए एक बार पुन: शाही सेना जैसलमेर की ओर अग्रसर हुई। भाटियों द्वारा पुन: उसी युद्ध नीति का पालन करते हुए अपनी प्रजा को शत्रुओं के सामने निरीह छोड़कर, रसद सामग्री एकत्र करके दुर्ग के द्वार बंद करके अंदर बैठ गए। शाही सैनिक टुकड़ी ने राज्य की सीमा में प्रवेश कर समस्त गाँवों में लूटपाट करते हुए पुन: दुर्ग के चारों ओर डेरा डाल दिया। यह घेरा भी एक लंबी अवधि तक चला। अंतत: स्त्रियों ने एक बार पुन: जौहर किया और रावल दूदा अपने साथियों सहित युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ। जैसलमेर दुर्ग और उसकी प्रजा सहित संपूर्ण-क्षेत्र वीरान हो गया। तत्कालीन योद्धाओं द्वारा न तो कोई युद्ध नीति बनाई जाती थी, न नवीनतम युद्ध तरीकों व हथियारों को अपनाया जाता था, सबसे बड़ी कमी यह थी कि राजा के पास कोई नियमित एवं प्रशिक्षित सेना भी नहीं होती थी। जब शत्रु बिल्कुल सिर पर आ जाता था तो ये राजपूत राजा अपनी प्रजा को युद्ध का आह्मवाहन कर युद्ध में झोंक देते थे व स्वयं वीरगति को प्राप्त कर आम लोगों को गाजर-मूली की तरह काटने के लिए बर्बर व युद्ध प्रिय तुर्कों के सामने जिन्हें अनगिनत युद्धों का अनुभव होता था, निरीह छोड़े देते थे। इस तरह के युद्धों का परिणाम तो युद्ध प्रारंभ होने के पूर्व ही घोषित होता था। इस उपन्यास की कथा इसी इतिहास को समेटकर सृजित हुई है।

चूँकि इस उपन्यास में अनेकों पात्र है इसलिए उन्हें याद रखना मुश्किल है। लेकिन कुछ पात्र निश्चित ही बरबस याद रह जाते हैं। जिनमें रावल बनने से पूर्व स्वयं दूदा और चारण कविराज सांदू हूफां। सांदू हूफां के बहाने लेखक ने अपना दृष्टिकोण रखने की कोशिश की है। जैसे जन्म से कोई बड़ा या छोटा नहीं होता। इस दुनिया में आने के बाद ही वह बनता बिगड़ता है। साधारण-असाधारण, अमीर-ग़रीब, पतित-पवित्र, छोटा-बड़ा, दीन-महान, सब कुछ बाद में ही होता है। घर, परिवार, समाज ही बनाता है उसे साधारण या असाधारण। पता ही नहीं चलता कब कौन सी चिंगारी उसे साधारण से असाधारण बना देती है। एक खंड में लेखक बधावा उच्छव (उत्सव) के बहाने स्थानीय सरदारों उमरावों की जो वहाँ एकत्र हुए थे। उनकी चिंताएँ बताते हुए लिखता है "राज के हालात ठीक नहीं थे। बधावा उच्छव में सरदारों-उमरावों से दूदा मिल जुल गए थे। उनकी शक्ति-ताक़त उनकी पैनी नज़रों से छिपी नहीं रह गई थी। पर सभी सरदार-उमराव लीक पर चलने वाले थे। नवीनता की परंपरा का समर्थक कोई नहीं था। कविराज की वाणी उन्हें आंदोलित कर रही थी। उन्हें मनुष्य का जीवन बड़ा अमूल्य लगने लगा था।" "किसी ऊँचे ध्येय के लिए इस अमोलक हीरे को बचा कर रखना है" अक्सर कविराज कहा करते थे। दूदा को रैयत की दुःख–पीड़ाएँ दिखाई देने लगी थीं। उनके सामने ऊँचा ध्येय प्रत्यक्ष हो रहा था राज और उसके षड्यन्त्रों से उन्हें विरक्ति होने लगी थी। लूट, अकाल, अभाव, दुःख और जीवट मरुभूमि के कठिन संघर्ष इस उपन्यास में बहुत जीवंत हैं। धन्ना काका, रतना, बातूनी रामू काका इन सबका चरित्र चित्रण नहुत भलमनसाहत के साथ किया गया है। अकाल का दृश्य मार्मिक है। "अकाल में लोग सुध-बुध खो रहे थे। एक टंक (वक्त) की रोटी मिल जाए बस। रामू कारीगर के पास दो गायें बची थीं। इलाके में घास का तिनका भी नहीं था। ढोले पड़ी गायों को मगना कारीगर और रामू काका ने मिलकर खड़ा किया। क्षणभर खड़ी रही गायें, और फिर काँपती हुईं गिर पड़ीं। रामू काका उनकी दशा देख फफक पड़े।"

इसी तरह हरिया का बाबा हरनाथ बन जाना जो एक मठ का महंत बन गया। बीच बीच में लोक संस्कृति, लोकगीत और गोरखवाणी का प्रयोग कथा में लालित्य उत्पन्न करता है। उपन्यास की कथा का मुख्य नायक दूदा रावल बनने के बाद जनता के प्रति अपने कर्तव्य की पूर्ति अपने नर्म स्वभाव की वज़ह करता अवश्य है लेकिन वह अपने जीवन की सार्थकता अपने प्राणों के उत्सर्ग में ही मानता है। और अंततः प्रजा को उसकी नियति पर छोड़कर अपनी मौत को ख़ुद दावत देता है। स्त्रियों को जौहर कराता है और अपने कुछ सैनिकों के साथ लड़कर मर जाता है। उस काल में इसी को शौर्य माना जाता था। चारण इसी शौर्य को बढ़ा-चढ़ा कर गाते और सुनाते थे। यदि आज की दृष्टि से देखा जाये तो यह अविवेक और अदूरदर्शिता का प्रतीक ही माना जायेगा। लेखक ने दूदा के बाद की कथा नहीं कही है। पता नहीं क्यों? इतिहास यह भी है अकबर के बादशाह बनने के उपरांत उसकी राजपूत नीति में व्यापक परिवर्तन आया जिसकी परणिति मुगल-राजपूत विवाह में हुई। सन् 1570 ई. में जब अकबर ने नागौर में मुकाम किया तो वहाँ पर जयपुर के राजा भगवानदास के माध्यम से बीकानेर और जैसलमेर दोनों को संधि के प्रस्ताव भेजे गए। जैसलमेर शासक रावल हरिराज ने संधि प्रस्ताव स्वीकार कर अपनी पुत्री नाथीबाई के साथ अकबर के विवाह की स्वीकृति प्रदान कर राजनैतिक दूरदर्शिता का परिचय दिया। रावल हरिराज का छोटा पुत्र बादशाह दिल्ली दरबार में राज्य के प्रतिनिधि के रुप में रहने लगा। अकबर द्वारा उस फैलादी का परगना जागीर के रूप में प्रदान की गई। भाटी-मुगल संबंध समय के साथ-साथ और मजबूत होते चले गए। शहज़ादा सलीम को हरिराज के पुत्र भीम की पुत्री ब्याही गई जिसे 'मल्लिका-ए-जहांन' का ख़िताब दिया गया था। स्वयं जहांगीर ने अपनी जीवनी में लिखा है – "रावल भीम एक पद और प्रभावी व्यक्ति था, जब उसकी मृत्यु हुई थी तो उसका दो माह का पुत्र था, जो अधिक जीवित नहीं रहा। जब मैं राजकुमार था तब भीम की कन्या का विवाह मेरे साथ हुआ और मैंने उसे 'मल्लिका-ए-जहांन' का ख़िताब दिया था। यह घराना सदैव से हमारा वफ़ादार रहा है इसलिए उनसे संधि की गई।" मुग़लों से संधि एवं दरबार में अपने प्रभाव का पूरा-पूरा लाभ यहाँ के शासकों ने अपने राज्य की भलाई के लिए उठाया तथा अपनी राज्य की सीमाओं को विस्तृत एवं सुदृढ़ किया। राज्य की सीमाएँ पश्चिम में सिंध नदी व उत्तर-पश्चिम में मुल्तान की सीमाओं तक विस्तृत हो गई। मुल्तान इस भाग के उपजाऊ क्षेत्र होने के कारण राज्य की समृद्धि में शनै:शनै: वृद्धि होने लगी। शासकों की व्यक्तिगत रुचि एवं राज्य में शांति स्थापित होने के कारण तथा जैन आचार्यों के प्रति भाटी शासकों का सदैव आदर भाव के फलस्वरूप यहाँ कई बार जैन संघ का आर्याजन हुआ। राज्य की स्थिति ने कई जातियों को यहाँ आकर बसने को प्रोत्साहित किया फलस्वरूप ओसवाल, पालीवाल तथा महेश्वरी लोग राज्य में आकर बसे व राज्य की वाणिज्यिक समृद्धि में अपना योगदान दिया। यहाँ से एक प्रशासनिक ढाँचे की शुरुआत होती है। यह काल महत्वपूर्ण है। इसे शौर्य का न सही बुद्धिमत्ता का काल अवश्य माना जायेगा। इसका समावेश भावुकता और बुद्धि के संतुलन सहायक हो सकता था। बहरहाल उपन्यास रोचक है और मेहनत से लिखा गया है इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें