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ISSN 2292-9754

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10.18.2017


याद

बरसों बाद
पीहर की दहलीज़,
आँख भर आई,
सोच
बेसुध सीढ़ियाँ चढ़ना
पापा के गले लग
रो देना,
हरेक का उनके
आदेश पर गिर्द घूमना,
खूँटी पर टंगा काला कोट,
मेज़ पर चश्मा, ऐश-ट्रे,
घर के हर कोने में
रौबीली गूँज।
आज घूरती आँखें,
रिश्तों को निभाती आवाज़ें,
समझती बेटी को बोझ,
हर तरफ़ परायापन
एक आवाज़ बुलाती,
जोड़ती उस पराये
दर से ‘पापा बुआ
आई हैं।’


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