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ISSN 2292-9754

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10.18.2017


प्रेमिकायें

न जाने किधर
लुप्त हो गईं
वो प्रेमिकायें
सुगंधित गुलाब सी,
मधुर गान सी,
मीठे ख़्वाब सी,
बादलों में मेघ सी,
दूध में उफ़ान सी,
मिट्टी की सोंधी
ख़ुश्बू सी,
सावन की पहली
बौछार सी, किताब में रखे पुराने फूल सी
हुआ करती थी कभी,
रहती पुरुष का
झरोखा बनकर
सदैव देती थी सूरज
की पहली किरन
चाँद की चाँदनी
भोर तक,
अहसास की
नाव में झुलाती
इस छोर से,
उस छोर तक।


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