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ISSN 2292-9754

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10.18.2017


पीपल का पेड़

सदियों पुराना, दादाओं का दादा,
गाँव के उस छोर पर खड़ा पीपल का पेड़।
दिन बीते, माह बीते, बरस बीते, दशक बीते,
सदियाँ बीत गईं, इंसान पुश्त-दर-पुश्त गया,
पर एक टाँग पर खड़ा
देखता रहा बदलते युगों को
ये पीपल का पेड़।

दुनिया क्या से क्या हो गई,
राजाओं के महल ढह गये,
पुरानी संस्कृति विलुप्त हो गई,
नई सभ्यता ने जन्म लिया, पर ये
सबको ताकता रहा पीपल का पेड़।

सदियों तक पूज्य रहा
सभ्य रहा, बना रहा
आभूषण ये पीपल का पेड़।

आज यह पूज्य नहीं, सभ्य नहीं,
चुपचाप काटा जाता है इसे,
वह भी लोगों की तरह अंधा, बहरा, गूँगा
व मूक बन जाता है।
देखता है सिर्फ, उसके आँसू,
ये गगन, ये हवा और देते
हैं आवाज़, चुप हो जा,
समझौता कर ले।
सह लेता है असंख्य वज्र
मूक खड़ा ये पीपल का पेड़।


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