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ISSN 2292-9754

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01.22.2018


पनघट सूने हो गये

जब से दिये हैं पलटे
माहौल ने समाज को
अब नहाती हैं
ग़ुसलखाने में नारियाँ
और पनघट
सूने हो गये।

चल पड़ते हैं नल
सुबहो-शाम
और चल नहीं पाती
सिर पर घड़ा लिए सुन्दरी
तब से वो रस्ते ही
सूने हो गये।

धूल मिट्टी से सनी
कई ओखलियाँ कई चक्कियाँ
सिसकती हैं चूड़ियों
की खनक को,
वो क्या जाने कितने आँगन
पायल की झंकार को तरसते
सूने हो गये।

शुरू हुआ है सिलसिला जब से
ज़मीन को हड़पने का,
चोटियों को क्या पता
कितने घर हैं
सूने हो गये।


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