अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
01.22.2018


मेरी ज़िन्दगी की किताब

दूर पर्वत की बर्फ़ भी
पिघला जाती है मुझे,
जब कभी महसूस करता हूँ -
तेरे हाथों का स्पर्श
फूट पड़ते हैं सहस्त्रों झरने...
मेरे मन अन्दर,
जब कभी तेरी
खनकती हँसी ने-
मुझे आ झंझोड़ा।

टूट जाऊँगी मैं जब
दुनिया के ज़ुल्मों से,
जोड़ देगा मुझे तेरा...
वो मुस्करा के चल देना।

खींचकर पल्लू मेरा,
बैठाना मुझको अपने पास,
ज़ार-ज़ार रुलाता है
मेरे दामन को आज भी
कहाँ लिखती मैं
दास्ताने ज़िन्दगी अपनी,
मेरी ज़िन्दगी की किताब-
भरी है तेरे दस्तख़तों से।

तुम्हारा अनकहा स्पर्श
बरसों बाद दिल की बंजर
ज़मीं पर महसूस किया
कुछ ठंडी बौछारों का स्पर्श,
और मुँद गई आँखें
ख़ुद-ब-ख़ुद ही देने के लिये...
नया आयाम।

लगा बीज बोने लगा कोई
प्यार का धीरे-धीरे
और बजा रहा है चुपचाप
मन की सूनी घंटियाँ।

डरने लगी हूँ
कहीं ये स्वप्न ही न हो
गर ऐसा हुआ तो
कितनी बुरी तरह
टूट जाऊँगी मैं
और
ये धरती...
इतनी पत्थरीली हो जायेगी कि
शायद इस पर
कभी कुछ उग भी न सकेगा।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें