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ISSN 2292-9754

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01.22.2018


टीस

 इक अजीब सी टीस ने
जन्म लिया और
दुश्वार हो गया मेरा जीना
रातों की नींद सपनों में
चली गई व दिल का
चैन उड़ा ले गया कोई

ऐसा क्यों हुआ मुझे
कुछ भी तो पता नहीं
ज़रूर किसी जन्म में, मेरे
शरीर का कोई हिस्सा रहे होंगे आप

सोचती हूँ आठों पहर तुम्हारी
आँखों में बैठी रहूँ छिपकर
और पाऊँ सहारा तुम्हारी
बलिष्ठ बाँहों का हरदम।

डरती हूँ ऐसी सोच से
पता नहीं कल्पना या सोच से
आगे जा सकूँगी या नहीं
यथार्थ को बदल पाऊँगी
या फिर सामाजिक कटघरे
में बंद होकर रह जाऊँगी।


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