अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
12.16.2018


बंटवारा

1
आपसी प्रतिवाद में विश्वास इतना घट गया
एक नए घर के लिए घर का ही आँगन बट गया
बँट रहे थे खेत सब दीवार तक भी बँट गई
संग किसके मँ रहे इसमें ही रातें कट गईं
आज बिल्कुल मौन हैं कैसे ये घर की टाठियाँ
दृश्य ऐसे देखकर रोने लगी सब लाठियाँ
एक दूजे के लिए अब प्रेम सबका घट गया
एक नए घर के लिए घर का ही आँगन बँट गया

2
बँट चुकी दीवार थी तब कोठरी खोली गई
सौ ग्राम कम मंजूर न था, गागरी तोली गई
बर्तन भी सारे बँट गए पर ग्लास था एक बच गया
युद्ध की वह भूमिका मानों अकेले रच गया
रख लो इसे तुम ही किसी से वाक्य न बोला गया
बाबू के अस्थि-कलश से वह अंततः तोला गया
देखकर यह दृश्य लोगो का कलेजा फट गया
एक नए घर के लिए घर का ही आँगन बँट गया
3
बर्तनों के बाद बिस्तर बाँटने की बात थी
आज बंटवारे की निश्चित आख़िरी यह रात थी
कथरियाँ तक बँट गयीं बस एक पर्दा शेष था
और अम्मा के उसी गिरदे को लेकर क्लेश था
न रहा कुछ शेष घर की खिड़कियाँ बाँटी गईं
थी विवादित इसलिए वह डेहरी काटी गई
देख कटती डेहरी अम्मा का दम तो घुट गया
एक नए घर के लिए घर का ही आँगन बँट गया


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें